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“एनएच-305 की पुकार”


खामोश पहाड़ों ने फिर एक चीख सुनी,
खाई में गिरती उम्मीदों की तस्वीर बनी।

जिभी–सोझा के मोड़ों पर दर्द बिखर गया,
एक और सफर यूं ही अधूरा ठहर गया।

सड़क तो थी, पर सुरक्षा कहीं खो गई,
लापरवाही फिर कई सांसों पर भारी हो गई।

हर बार हादसा, फिर वादों की भरमार,
क्यों जागता सिस्टम बस हादसों के बाद हर बार?

जलोरी से घियागी तक सवाल खड़े हैं,
कितनी जानें जाएं, तब हालात बड़े हैं?

ये रास्ता नहीं, अब दर्द की लकीर है,
जनता की पुकार—अब जवाब की तासीर है।

उठो अब, ये खामोशी तोड़नी होगी,
इस “जीवनरेखा” को फिर से जोड़नी होगी

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