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राष्ट्रीय पर्यटन दिवस : हिमाचल की अर्थव्यवस्था, पहचान और जिम्मेदारी

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राष्ट्रीय पर्यटन दिवस पर विशेष।

25 जनवरी को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय पर्यटन दिवस केवल शुभकामनाओं का अवसर नहीं, बल्कि यह समझने का दिन है कि पर्यटन हिमाचल प्रदेश के लिए शौक नहीं, जीवनरेखा है। पहाड़ों की इस भूमि में पर्यटन सिर्फ़ तस्वीरें नहीं गढ़ता, बल्कि रोज़गार, राजस्व और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव रखता है।


तथ्य यह है कि हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का योगदान अनुमानतः 7–8 प्रतिशत तक है। राज्य में प्रतिवर्ष 1.5 से 2 करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं, जिनमें देशी के साथ विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं। होटल, होम-स्टे, टैक्सी, गाइड, हस्तशिल्प, सेब और स्थानीय उत्पाद—हिमाचल का बड़ा वर्ग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पर्यटन पर निर्भर है।


पर्यटन ने मनाली, शिमला, धर्मशाला जैसे शहरों को पहचान दी, लेकिन जिभी, तीर्थन, चितकुल, स्पीति और पांगी जैसे क्षेत्रों को रोज़गार का नया रास्ता भी दिखाया। यह पर्यटन का सकारात्मक पक्ष है—विकेंद्रीकरण और स्थानीय भागीदारी।
लेकिन सच्चाई का दूसरा पहलू भी उतना ही तथ्यपरक है। अत्यधिक पर्यटक दबाव, अनियोजित निर्माण, ट्रैफिक जाम, कचरा और जल संकट अब हिमाचल के प्रमुख पर्यटन स्थलों की स्थायी समस्या बन चुके हैं। पर्यटन बढ़ा है, पर स्थायी पर्यटन (Sustainable Tourism) की रफ्तार अभी धीमी है।


राष्ट्रीय पर्यटन दिवस हिमाचल को यह याद दिलाता है कि— पर्यटन केवल कमाई नहीं, संरक्षण की जिम्मेदारी भी है।
पहाड़ की सहनशीलता सीमित है, लेकिन लालच असीमित होता जा रहा है।


आज ज़रूरत इस बात की है कि हिमाचल में पर्यटन संख्या आधारित नहीं, क्षमता आधारित हो। स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़े, पर्यावरणीय नियम सख़्ती से लागू हों और पर्यटन विकास नीति केवल काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखे।
राष्ट्रीय पर्यटन दिवस पर हिमाचल का संदेश स्पष्ट होना चाहिए—
पहाड़ बिकाऊ नहीं हैं, साझा करने के लिए हैं।
पर्यटन तभी सफल है, जब अगली पीढ़ी भी वही सुंदर हिमाचल देख सके, जो आज पर्यटकों को आकर्षित करता है।

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