राष्ट्रीय बालिका दिवस विशेष
भारत जैसे युवा देश में बालिका का प्रश्न केवल लैंगिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक और नैतिक दिशा से जुड़ा हुआ विषय है। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यही याद दिलाने आता है कि किसी भी सभ्य समाज की प्रगति का पैमाना उसकी बेटियों की स्थिति से तय होता है।
आज भी तमाम सरकारी योजनाओं, नारों और अभियानों के बावजूद बालिकाएँ कई स्तरों पर असमानता, उपेक्षा और हिंसा का सामना कर रही हैं। जन्म से पहले चयन, जन्म के बाद भेदभाव, शिक्षा में बाधाएँ, किशोरावस्था में असुरक्षा और युवावस्था में अवसरों की कमी—यह श्रृंखला अब भी टूटी नहीं है।
यह विडंबना ही है कि एक ओर देश ‘नारी शक्ति’ की बात करता है, वहीं दूसरी ओर बालिकाओं की शिक्षा पर खर्च को बोझ समझा जाता है। ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी बाल विवाह, स्कूल छोड़ने की दर और पोषण की कमी जैसी समस्याएँ बालिकाओं के भविष्य को कमजोर कर रही हैं। यह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की भी गंभीर असफलता है।
हालाँकि यह भी सच है कि जहाँ अवसर मिले हैं, वहाँ बालिकाओं ने हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है—चाहे वह शिक्षा हो, खेल, विज्ञान, प्रशासन या सेना। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि समस्या क्षमता की नहीं, बल्कि अवसर और दृष्टिकोण की है।
राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल औपचारिक कार्यक्रमों और भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह दिन आत्ममंथन का अवसर होना चाहिए—क्या हमारी नीतियाँ ज़मीन तक पहुँच रही हैं? क्या स्कूल, समाज और परिवार बालिकाओं के लिए सुरक्षित और समान हैं? क्या हम बेटियों को निर्णय लेने का अधिकार दे पा रहे हैं?
आवश्यकता इस बात की है कि बालिका को “सुरक्षा की वस्तु” नहीं, बल्कि “सम्भावनाओं की शक्ति” के रूप में देखा जाए। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, डिजिटल साक्षरता और आत्मनिर्भरता—इन पाँच स्तंभों पर यदि ईमानदारी से काम किया गया, तो बालिका सशक्तिकरण स्वतः ही राष्ट्र सशक्तिकरण में बदल जाएगा।
अंततः, बालिका दिवस का असली सम्मान तब होगा जब हर बेटी को जन्म से लेकर सपनों तक समान अवसर मिलें—और जब समाज यह स्वीकार कर ले कि बेटियाँ बोझ नहीं, भविष्य हैं।
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बालिका सशक्तिकरण नहीं, राष्ट्र सशक्तिकरण का प्रश्न
On: January 24, 2026 12:32 PM




























