फ्रंट पेज न्यूज डेस्क
भारत में महिला समानता को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अब भी असहज करने वाली है। आज भी देश के बड़े हिस्से में बेटियाँ अधिकार नहीं, बल्कि अपवाद की तरह देखी जाती हैं। संपत्ति, वंश और परिवार की जिम्मेदारी का “स्वाभाविक” हक अब भी बेटे को माना जाता है। इसी पृष्ठभूमि में मेघालय का खासी समाज देश की मुख्यधारा की सोच को सीधी चुनौती देता नज़र आता है।
खासी समाज में वंश परंपरागत रूप से माँ से चलता है। बच्चे पिता नहीं, माँ का उपनाम अपनाते हैं। परिवार की पैतृक संपत्ति की उत्तराधिकारी सबसे छोटी बेटी होती है, जिसे ‘का खाद्दुह’ कहा जाता है। यह व्यवस्था उस गहरी जड़ जमाई पितृसत्तात्मक सोच पर करारा प्रहार है, जिसमें बेटे को वंश और संपत्ति का जन्मसिद्ध अधिकारी मान लिया जाता है।
खासी समाज का मॉडल यह साफ करता है कि समाज में स्त्री-पुरुष की भूमिकाएँ कोई प्राकृतिक नियम नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था का नतीजा होती हैं। जो सोच सदियों से “परंपरा” के नाम पर चलाई जाती रही है, उसे बदला भी जा सकता है—खासी समाज इसका जीवित उदाहरण है।
यहाँ संपत्ति केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानी जाती है। ‘का खाद्दुह’ को केवल घर-जमीन का स्वामित्व ही नहीं मिलता, बल्कि माता-पिता की देखभाल, परिवार की एकता बनाए रखने और पारिवारिक ढांचे को संभालने की जिम्मेदारी भी उसी पर होती है। इसके उलट, देश के अधिकांश हिस्सों में संपत्ति का मतलब सिर्फ कब्जा और बँटवारा बनकर रह गया है, जहाँ जिम्मेदारी की भावना लगातार कमजोर होती चली गई है।
हालांकि यह व्यवस्था किसी एकतरफा “महिला-राज” की तस्वीर भी नहीं है। खासी समाज में सामाजिक और सामुदायिक फैसलों में पुरुषों की भूमिका बनी रहती है। यानी यह मॉडल टकराव नहीं, बल्कि संतुलन और साझा जिम्मेदारी पर टिका हुआ है। यही वजह है कि यह व्यवस्था केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी दिखाई देती है।
दिलचस्प बात यह है कि आज खुद खासी समाज के भीतर भी इस परंपरा को लेकर बहस चल रही है। बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के साथ इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह दिखाता है कि परंपराएँ जड़ नहीं होतीं—वे समय के साथ खुद को साबित भी करती हैं और बदलने की कसौटी पर भी चढ़ती हैं।
लेकिन भारत के लिए असली सवाल यह नहीं है कि खासी मॉडल अपनाया जाए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या देश अपनी पितृसत्तात्मक मानसिकता पर ईमानदारी से सवाल उठाने के लिए तैयार है? क्या हम यह मानने को तैयार हैं कि समस्या बेटियों में नहीं, बल्कि सोच में है?
मेघालय का खासी समाज कोई आदर्श कहानी नहीं, बल्कि एक जीवित सामाजिक सच्चाई है। वह बिना किसी प्रचार के यह साबित कर रहा है कि समानता केवल कानून बनाने से नहीं आती, बल्कि सामाजिक सोच बदलने से आती है। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक महिला समानता के सारे दावे कागज़ों, भाषणों और नारों तक ही सीमित रहेंगे।






























