संपादकीय।
नववर्ष की शुभकामनाओं के बीच समाज के सामने खड़ी एक कड़वी सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता—नशे का बढ़ता अँधेरा। यह अँधेरा आज केवल महानगरों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे कस्बों और गाँवों की गलियों में भी चुपचाप पसर चुका है। सबसे अधिक इसकी चपेट में है हमारा युवा वर्ग, जो ऊर्जा, सपनों और संभावनाओं का प्रतीक माना जाता है।
नशे की लत किसी एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं होती; यह उस सामाजिक ताने-बाने की दरार को उजागर करती है, जहाँ संवाद टूट चुका है, मार्गदर्शन कमज़ोर पड़ गया है और संवेदनाएँ सुस्त हो गई हैं। ऐसे में जब कोई युवा गलत संगत, तात्कालिक सुख या झूठे साहस के भ्रम में फँसता है, तो उसका गिरना केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं रहता—वह पूरे समाज की हार बन जाता है।
लेकिन इसी अँधेरे में उम्मीद की एक रोशनी भी है—दोस्ती, संवेदना और समय पर किया गया हस्तक्षेप। जब कोई मित्र उपेक्षा, तिरस्कार या दूरी के बजाय संवाद और विश्वास का रास्ता चुनता है, तब नशे का सबसे मज़बूत किला भी हिलने लगता है। दोस्ती केवल साथ घूमने या खुशियाँ बाँटने का नाम नहीं, बल्कि कठिन समय में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने का साहस भी है।
नशामुक्ति की राह आसान नहीं होती। इसमें धैर्य चाहिए, निरंतर साथ चाहिए और सबसे बढ़कर यह विश्वास चाहिए कि बदलाव संभव है। जो युवा आज नशे से बाहर आकर समाज को चेतावनी और प्रेरणा दे रहे हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि सही समय पर मिला सहारा किसी भी जीवन की दिशा बदल सकता है।
यह संपादकीय हमें यह याद दिलाने के लिए है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल कानून, पुलिस या सरकार के भरोसे नहीं जीती जा सकती। परिवारों को सुनना होगा, दोस्तों को देखना होगा और समाज को जागना होगा। हर गली, हर मोहल्ले और हर स्कूल-कॉलेज में यह भावना मजबूत करनी होगी कि कोई भी युवा अकेला नहीं है।
यदि हम सजग मित्र बनें, संवेदनशील परिवार बनें और जिम्मेदार समाज बनें, तो नशे का अँधेरा स्वतः ही छँटने लगेगा।
नववर्ष पर यही संकल्प हो—
कोई दोस्त छूटे नहीं, कोई दीपक अँधेरे में खोए नहीं।





























