फ्रंट पेज न्यूज कुल्लू।
देवभूमि कुल्लू में पौष मास की संक्रांति के साथ ही देवी-देवताओं के स्वर्ग प्रवास की परंपरा एक बार फिर शुरू हो गई है। इसके चलते आगामी करीब दो माह तक जिले के अनेक देवालयों में सन्नाटा पसरा रहेगा। देवी-देवताओं के कपाट बंद हो गए हैं और पूजा-अर्चना सहित सभी देव कार्यक्रमों पर विराम लग गया है। यही नहीं, इस अवधि में जिले के कई क्षेत्रों में विवाह-शादी व अन्य शुभ कार्य भी स्थगित रहेंगे।
मान्यता के अनुसार, कुल्लू जिले के सैकड़ों देवी-देवता स्वर्ग प्रवास पर जाकर राजा इंद्र के दरबार में अपने-अपने क्षेत्रों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और कल्याण के लिए मंत्रणा करते हैं। इस दौरान वे दिव्य शक्ति अर्जित कर पुनः धरती पर लौटते हैं और क्षेत्रवासियों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। प्रमुख देवता लगभग दो माह बाद अपने क्षेत्रों में वापसी करते हैं, जबकि कुछ देवी-देवता एक माह बाद ही स्वर्ग से लौट आते हैं।
हर वर्ष पौष मास की शुरुआत होते ही जिले के विभिन्न उपमंडलों में देव रथों को विधिवत लाल वस्त्रों से ढक दिया जाता है। देवालयों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और देवता के नाम पर कोई सार्वजनिक आयोजन नहीं होता। कुछ स्थानों पर मकर संक्रांति के दिन थोड़े समय के लिए लाल वस्त्र हटाकर परंपरागत रीति निभाई जाती है, जबकि कई देवताओं के कपाट फाल्गुन संक्रांति के अवसर पर पुनः खोले जाते हैं।
देव कारकूनों विष्वा देव शर्मा, रोशन लाल शर्मा, चेतन शर्मा, टेढ़ी सिंह नेगी, लीला धर शर्मा और उत्तम शर्मा ने बताया कि पौष मास की संक्रांति को शुभ मुहूर्त में देव रथों को ढकने की परंपरा निभाई गई। इस दौरान देवी-देवताओं की मानसिक पूजा-अर्चना की जाती है। कुछ स्थानों पर देव निशान कुल पुरोहितों के घरों में रखकर विधिवत पूजा की जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी पूरी श्रद्धा व आस्था के साथ निभाई जा रही है। इसी आस्था का परिणाम है कि हिमाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में आज भी भारतीय संस्कृति और देव परंपराएं जीवंत रूप में संरक्षित हैं। पौष संक्रांति की सुबह ही कुल्लू जिले के दर्जनों देवी-देवता स्वर्ग प्रवास के लिए रवाना हो गए, जिससे देवभूमि में एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण बन गया है।














