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कर्ज से नए साल का स्वागत: क्या आत्मनिर्भर हिमाचल का सपना कर्ज के बोझ तले दब जाएगा?

On: December 26, 2025 9:40 PM
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फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।
नया साल 2026 हिमाचल प्रदेश के लिए उम्मीदों के साथ-साथ गंभीर आर्थिक सवाल भी लेकर आ रहा है। साल के अंतिम दिन 31 दिसंबर 2025 को प्रदेश सरकार द्वारा 1000 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया जाना तय है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का कहना है कि यह कर्ज राज्य के विकास कार्यों के लिए लिया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश पर कुल कर्ज का आंकड़ा अब एक लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंचता दिख रहा है। ऐसे में सरकार के आत्मनिर्भर हिमाचल के दावे पर सवाल उठना लाज़मी है।
राज्य सरकार को हर महीने कर्मचारियों के वेतन और पेंशनधारियों की पेंशन के लिए लगभग 2000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होती है। जनवरी 2026 से इस बोझ में और इजाफा होगा, क्योंकि ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) पूरी तरह लागू हो चुकी है। वित्तीय विशेषज्ञ मानते हैं कि OPS के चलते सरकार के दीर्घकालिक दायित्व कई गुना बढ़ गए हैं, जिनकी भरपाई मौजूदा राजस्व से कर पाना आसान नहीं है। इसी वजह से सरकार को बार-बार बाजार से कर्ज लेना पड़ रहा है।

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वित्त विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार यह 1000 करोड़ रुपये का कर्ज 15 वर्षों की अवधि के लिए लिया जा रहा है और इसके लिए 30 दिसंबर को ऑक्शन प्रक्रिया अपनाई जाएगी। सरकार का तर्क है कि यह राशि विकास कार्यों पर खर्च होगी, लेकिन वास्तविकता यह भी है कि बीते महीनों में लिए गए कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और अन्य नियमित खर्चों में खप गया। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या नया कर्ज भी वास्तव में विकास में लगेगा या फिर रोजमर्रा के खर्चों की भरपाई में चला जाएगा।
पिछले कुछ महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। दिसंबर की शुरुआत में सरकार ने 350 करोड़ रुपये, नवंबर में 300 करोड़ रुपये और अक्टूबर में 200 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था। यानी केवल अंतिम तिमाही में ही सरकार लगभग 1350 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ प्रदेश पर डाल चुकी है। अब 1000 करोड़ का नया कर्ज जुड़ने से राज्य की वित्तीय स्थिति और दबाव में आ गई है।
सरकार को उम्मीद है कि 16वां वित्त आयोग हिमाचल प्रदेश के लिए अच्छी-खासी रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट की सिफारिश करेगा, जिससे वेतन और पेंशन का बोझ कुछ हद तक कम हो सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त आयोग की मदद अस्थायी राहत तो दे सकती है, लेकिन इससे राज्य की संरचनात्मक आर्थिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होगा।
मुख्यमंत्री सुक्खू का दावा है कि उनकी सरकार ने अपने प्रयासों से 2600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व जुटाया है। सरकार का कहना है कि पर्यटन, जलविद्युत और अन्य क्षेत्रों में सुधार कर भविष्य में आय बढ़ाई जाएगी। दूसरी ओर विपक्षी भारतीय जनता पार्टी का आरोप है कि कांग्रेस सरकार ने कर्ज लेने के मामले में सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और प्रदेश को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी इन आरोपों को खारिज करते हुए पूर्व सरकारों की नीतियों और प्राकृतिक आपदाओं को मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार ठहराती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश सरकार लगातार कर्ज ले रही है, तो आत्मनिर्भर हिमाचल का लक्ष्य कैसे हासिल होगा? आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल केंद्र पर निर्भरता कम करना नहीं, बल्कि अपने संसाधनों से इतना राजस्व पैदा करना है कि रोजमर्रा के खर्चों के लिए उधार न लेना पड़े। इसके लिए जरूरी है कि कर्ज का इस्तेमाल केवल वेतन-पेंशन में न होकर उत्पादक क्षेत्रों—जैसे पर्यटन, हरित ऊर्जा, कृषि आधारित उद्योग और स्थानीय रोजगार—में किया जाए।
यदि सरकार कर्ज को विकास की मजबूत नींव बनाने में सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में राजस्व बढ़ सकता है और कर्ज का बोझ संभालने योग्य बन सकता है। लेकिन यदि कर्ज केवल खर्च चलाने का जरिया बना रहा, तो इसका भार आने वाली पीढ़ियों को चुकाना पड़ेगा। नए साल की पूर्व संध्या पर लिया जा रहा यह 1000 करोड़ रुपये का कर्ज इसलिए केवल एक वित्तीय फैसला नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के आर्थिक भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम भी है।

2026 की शुरुआत हिमाचल प्रदेश में कर्ज के साथ हो रही है। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस कर्ज को बोझ बनने दे या इसे आत्मनिर्भरता की सीढ़ी में बदल पाए।

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