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कर्मचारियों की एनपीएस और ओपीएस पर बवाल नेताओं की बहाल

फ्रंट पेज न्यूज़ धर्मशाला।

हिमाचल प्रदेश में पेंशन व्यवस्था को लेकर चल रहा ओपीएस–एनपीएस विवाद एक बार फिर नई गर्माहट पकड़ चुका है। सुक्खू सरकार की पहली कैबिनेट बैठक की समीक्षा के दौरान नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर द्वारा दिया गया बयान लाखों कर्मचारियों के बीच बेचैनी और असंतोष की लहर पैदा कर रहा है।

यह गुस्सा इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि पेंशन किसी कर्मचारी के लिए केवल आर्थिक प्रावधान नहीं होती, बल्कि सेवा-पश्चात उसकी गरिमा, सुरक्षा और परिवार की जीवनभर की स्थिरता का आधार मानी जाती है। कर्मचारियों का कहना है कि ओपीएस और एनपीएस के बीच का फर्क सिर्फ काग़ज़ी नियमों का नहीं, बल्कि उनकी पूरी जीवनशैली और भविष्य की गुणवत्ता का है। ओपीएस के तहत अंतिम वेतन का पचास प्रतिशत पेंशन, डीए, चिकित्सा सुविधा और पारिवारिक पेंशन जैसी स्थायी सुविधाएँ मिलती थीं, जबकि एनपीएस में कर्मचारी की कमाई का 12 से 14 प्रतिशत तथा सरकार का समान योगदान जमा होने के बावजूद रिटायरमेंट पर केवल साठ प्रतिशत राशि ही मिलती है और शेष चालीस प्रतिशत एन्युटी में जाती है। समस्या यह है कि इसी एन्युटी से मिलने वाली पेंशन ओपीएस के मुकाबले आठ से दस गुना कम बैठती है, जिसे न तो महंगाई भत्ता मिलता है और न ही स्थिर आय की गारंटी होती है। ऊपर से जमा राशि भी किसी आपात स्थिति में निकाली नहीं जा सकती, जिससे कर्मचारी वर्ग इसे सुरक्षा नहीं बल्कि असुरक्षा और अनिश्चितता वाली निजी ढांचे की स्कीम मानता है।

इसी पृष्ठभूमि में कर्मचारी संगठनों ने भी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

एनपीएस कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप ठाकुर ने स्पष्ट कहा है कि एनएसडीएल में अटके बारह हजार करोड़ रुपये तुरंत लौटाए जाएं, क्योंकि हिमाचल में कर्मचारी ओपीएस के दायरे में आ चुके हैं और केंद्र की अस्पष्ट नीति ने बेवजह भ्रम की स्थिति बना दी है।

एनपीएसईए कांगड़ा के अध्यक्ष राजेंद्र मिन्हास ने भी नेता प्रतिपक्ष से सीधा सवाल किया है कि यदि उनका बयान ओपीएस के खिलाफ नहीं था, तो वे स्पष्ट करें कि ओपीएस पर उनका वास्तविक रुख क्या है, क्योंकि अभी की स्थिति में कर्मचारी भ्रमित हो रहे हैं और यह स्थिति किसी भी तरह उचित नहीं है। इस बीच युवा वर्ग भी अपनी नाराज़गी खुलकर प्रकट कर रहा है।

साधारण कामकाज करने वाले टेक सिंह नेगी का कहना है कि नेताओं की पेंशन बंद होनी चाहिए और कर्मचारी को उसकी सेवा के अनुसार सुरक्षा मिलनी चाहिए, क्योंकि पेंशन कोई विशेषाधिकार नहीं बल्कि उसका मौलिक अधिकार है।

कर्मचारी आज भी जय राम ठाकुर के उस पुराने बयान को नहीं भूले हैं, जिसमें उन्होंने कहा था—“पेंशन चाहिए तो चुनाव लड़ो।” यह टिप्पणी उस समय भी कर्मचारियों की भावनाओं पर गहरी चोट कर गई थी, और मौजूदा बयानबाज़ी ने उस पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया है। इन परिस्थितियों में यह साफ़ दिखाई देता है कि हिमाचल में ओपीएस लागू होने के बावजूद केंद्र में फंड अटका रहना, एनपीएस की जटिलताएँ और नेताओं के दोहरे संकेत कर्मचारी वर्ग को राहत देने के बजाय और चिंता दे रहे हैं। मौजूदा स्थितियाँ बताती हैं कि पेंशन किसी स्कीम का नाम नहीं, बल्कि एक कर्मचारी के पूरे परिवार की साझा सुरक्षा है और जब तक राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे पर साफ़ और दृढ़ रुख नहीं अपनाता, तब तक यह विवाद शांत होने के बजाय किसी भी समय और तीखा हो सकता है।

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