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हिमाचल में छाया ‘जापानी फल’ का जादू: किसान कमा रहे दोगुना मुनाफा, जानिए पूरी वैज्ञानिक खेती तकनीक

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फ्रंट पेज न्यूज़ (राजीव बग्गा)

कुल्लू/शिमला। पहाड़ी जिलों में जापानी फल (Persimmon) की खेती लगातार तेजी पकड़ रही है। बाज़ार में अच्छी कीमत और कम बीमारी की वजह से किसान अब इसे पारंपरिक फलों के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाएं, तो प्रति पौधा 40 से 60 किलो तक आसानी से उत्पादन लिया जा सकता है।

अनुकूल जलवायु और सही मिट्टी से होती है शुरुआत

विशेषज्ञों के अनुसार जापानी फल ठंडे और मध्यम तापमान वाले क्षेत्रों में सबसे अच्छा उत्पादन देता है। 15°C से 28°C तक का तापमान आदर्श माना जाता है। हल्की दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी अच्छी हो, पौधों की बढ़वार को मजबूत बनाती है। रोपाई से पहले खेत की दो–तीन बार जुताई जरूरी बताई जाती है।

पौधारोपण फरवरी–अप्रैल में सबसे उपयुक्त

खेती विशेषज्ञ गड्ढों का आकार 2x2x2 फीट रखने और पौधों के बीच दूरी लगभग 15–18 फीट रखने की सलाह देते हैं। रोपाई के समय गड्ढों में गोबर की खाद, नीमखली और सुपरफॉस्फेट मिलाने से पौधों का विकास तेज होता है।

सिंचाई और खाद—उत्पादन बढ़ाने की असली कुंजी

जापानी फल में नियमित नमी की आवश्यकता होती है, पर जलभराव नुकसानदायक हो सकता है।

गर्मियों में सिंचाई: 10–12 दिन में एक बार

सर्दियों में: महीने में एक बार

ड्रिप सिस्टम से किसानों को बेहतर नतीजे मिल रहे हैं।

खाद का वैज्ञानिक मानक:

गोबर की खाद: 25–30 किलो प्रति पौधा

यूरिया: 300–350 ग्राम

डीएपी: 200–250 ग्राम

पोटाश: 200–300 ग्राम

खाद को मार्च, जून और सितंबर में तीन भागों में बांटकर देना उत्पादन बढ़ाने का प्रभावी तरीका माना गया है।

कीट नियंत्रण: तीन स्प्रे पर्याप्त, दवाइयों का सही चुनाव महत्वपूर्ण

हालांकि जापानी फल पर बहुत अधिक बीमारियाँ नहीं लगतीं, फिर भी समय–समय पर कीट नियंत्रण आवश्यक है।

मुख्य समस्याएँ और समाधान

फल मक्खी: स्पिनोसैड या डेल्टामेथ्रिन का स्प्रे दो बार, 15 दिन के अंतर से

एफिड/जूँ: इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव

पत्ती धब्बा रोग: मैन्कोज़ेब + कार्बेन्डाजिम (जैसे SAAF) का स्प्रे

जैविक खेती करने वाले किसान नीम तेल और फेरोमोन ट्रैप का उपयोग भी कर सकते हैं।

फूल से फल बनने में तीन वर्ष, चौथे साल मिलता है भारी उत्पादन

कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि रोपाई के 2–3 साल बाद पौधे में फूल आने शुरू हो जाते हैं, जबकि चौथे साल से व्यावसायिक पैमाने पर फल मिलना शुरू हो जाता है। उन्नत प्रबंधन के साथ प्रौढ़ पौधे 40–60 किलो तक उत्पादन दे रहे हैं।

बाजार में बढ़ रही मांग, किसानों को मिल रही अच्छी कीमत

हिमाचल के मनाली, शिमला, मंडी और कुल्लू क्षेत्र के किसानों को इस फल की अच्छी कीमत मिल रही है। जापानी फल मुलायम होने के कारण इसे सावधानी से पैक करना जरूरी होता है। फोम ट्रे और नेट पैकिंग से इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है।

जापानी फल किसानों के लिए उभरता लाभकारी विकल्प

बेहतर जलवायु, वैज्ञानिक खाद प्रबंधन, नियंत्रित दवाइयों और उचित सिंचाई के साथ जापानी फल की खेती आने वाले वर्षों में किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन बनने जा रही है। कृषि विभाग भी किसानों को इस नई फसल की ओर प्रेरित कर रहा है ताकि बागवानी क्षेत्र में वैकल्पिक खेती को बढ़ावा मिल सके।

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