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बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के बीच हिमालयी क्षेत्र के लिए केंद्रीय बजट में अलग समर्पित आपदा व जलवायु कोष की मांग

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फ्रंट पेज न्यूज़ दिल्ली।

हिमालय की बढ़ती आपदाओं पर नागरिक समाज की बड़ी मांग: केंद्रीय बजट में बने अलग ‘हिमालय आपदा एवं जलवायु अनुकूलन कोष’
नई दिल्ली/हिमाचल प्रदेश।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को लेकर नागरिक समाज संगठनों ने केंद्र सरकार का ध्यान आकृष्ट किया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को भेजे गए एक विस्तृत ज्ञापन में नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि आगामी केंद्रीय बजट में हिमालयी क्षेत्र के लिए विशेष, समर्पित और रिंग-फेंस्ड बजटीय प्रावधान किए जाएं, ताकि आपदा रोकथाम, तैयारी, त्वरित राहत, पुनर्वास और दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित किया जा सके।
ज्ञापन में कहा गया है कि बीते कुछ वर्षों में हिमालयी राज्यों में क्लाउडबर्स्ट, अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर झील विस्फोट, जंगलों में आग, भूकंप और जल संकट की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इन आपदाओं ने न केवल हजारों परिवारों की जान और आजीविका छीनी है, बल्कि सड़कों, पुलों, घरों और सार्वजनिक ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। संगठनों का कहना है कि हिमालय की पारिस्थितिकी और भू-वैज्ञानिक संरचना अत्यंत नाजुक है और सामान्य बजटीय प्रावधान इस क्षेत्र की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने में नाकाम साबित हो रहे हैं।
नागरिक समाज ने केंद्रीय बजट में हिमालयी राज्यों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन योजनाओं, ढलान स्थिरीकरण, भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण, जलागम और स्प्रिंगशेड प्रबंधन के लिए विशेष फंड की मांग की है। साथ ही जलवायु-संवेदनशील आजीविका विकल्पों और सतत पर्यटन मॉडल को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है, ताकि स्थानीय समुदायों को सुरक्षित और टिकाऊ रोजगार मिल सके।
ज्ञापन में आपदा तैयारी को मजबूत करने के लिए गांव-स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाएं, जोखिम मानचित्रण, पंचायतों, महिला समूहों और युवाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, तथा बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर झील विस्फोट के लिए प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की आवश्यकता बताई गई है। इसके अलावा शैक्षणिक संस्थानों में हिमालयी क्षेत्र के लिए अलग से आपदा प्रबंधन अध्याय शामिल करने की भी मांग की गई है, ताकि बच्चों और युवाओं में जोखिम को लेकर समझ विकसित हो सके।
आपदा के समय राहत व्यवस्था को लेकर संगठनों ने खाद्यान्न, दवाइयों, ईंधन और आवश्यक सामग्री के पूर्व भंडारण, सौर ऊर्जा आधारित प्रकाश और संचार व्यवस्था, तथा गरिमा-संपन्न अस्थायी आश्रयों की जरूरत पर बल दिया है। इसके साथ ही सामुदायिक स्तर पर प्रशिक्षित त्वरित प्रतिक्रिया दलों के गठन को भी अहम बताया गया है, जिससे शुरुआती घंटों में जान-माल का नुकसान कम किया जा सके।
ज्ञापन में आपदाओं के बाद लंबे समय तक रहने वाले मानसिक आघात की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। संगठनों का कहना है कि बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए मनो-सामाजिक सहयोग और परामर्श की व्यवस्था को अब आपदा प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए। इसके लिए मोबाइल मानसिक स्वास्थ्य इकाइयों और गांव तथा राहत शिविर स्तर पर प्रशिक्षित काउंसलरों की तैनाती के लिए अलग बजट की मांग की गई है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते विस्थापन पर चिंता जताते हुए संगठनों ने ‘जलवायु शरणार्थी’ को कानूनी मान्यता देने, उनके पुनर्वास के लिए भूमि बैंक और भूमि पूलिंग की व्यवस्था करने तथा वैज्ञानिक आधार पर सुरक्षित क्षेत्रों में योजनाबद्ध पुनर्स्थापन की मांग भी उठाई है। साथ ही पहले से भूस्खलन, धंसाव या डूब क्षेत्र घोषित हो चुके गांवों के प्राथमिक पुनर्वास को जरूरी बताया गया है।
नागरिक समाज का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में भविष्य की अवैज्ञानिक और आपदा-प्रवण परियोजनाओं से बचते हुए पर्यावरण-संवेदनशील और भू-आकृतिक रूप से उपयुक्त अधोसंरचना विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही अनुभवी वैज्ञानिकों, नागरिक संगठनों और जमीनी संस्थाओं को औपचारिक भागीदार बनाकर राहत, पुनर्वास और निगरानी की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
ज्ञापन में यह भी रेखांकित किया गया है कि हिमालय केवल पर्वतीय क्षेत्र नहीं, बल्कि पूरे देश की जल, जलवायु और जैव विविधता की जीवनरेखा है। इसकी सुरक्षा पर किया गया निवेश कोई अतिरिक्त खर्च नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी और दीर्घकालिक सुरक्षा का सवाल है। संगठनों ने उम्मीद जताई है कि केंद्र सरकार आगामी बजट में हिमालयी क्षेत्र के लिए विशेष ‘हिमालय आपदा लचीलापन एवं जलवायु अनुकूलन कोष’ की घोषणा कर इस गंभीर चुनौती का ठोस समाधान निकालेगी।

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