फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।
Himachal Pradesh Vidhan Sabha के शीतकालीन सत्र में हिमाचल प्रदेश शॉप्स एंड कमर्शियल एस्टेबलिशमेंट (संशोधन) विधेयक, 2025 को 4 दिसंबर को पेश कर उसी दिन सर्वसम्मति से पारित किया गया था। हालांकि, विधेयक से जुड़े प्रावधानों और इसके प्रभावों को लेकर आज भी राजनीतिक और कारोबारी हलकों में चर्चा बनी हुई है, क्योंकि यह कानून 56 साल बाद बड़े बदलाव के साथ लागू होने की दिशा में है।
विधेयक को सदन में प्रस्तुत करते हुए उद्योग एवं संसदीय कार्य मंत्री Harshwardhan Chauhan ने इसे 1969 के कानून को वर्तमान आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप ढालने की जरूरत बताया था। सरकार का तर्क है कि बदलते व्यापार मॉडल, स्टार्टअप संस्कृति और सूक्ष्म उद्यमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नियमों का सरलीकरण जरूरी था।
पंजीकरण के प्रावधान पर अब भी बहस
आज की तारीख में भी विधेयक का सबसे चर्चित पहलू पंजीकरण की अनिवार्यता बना हुआ है। शीतकालीन सत्र के दौरान भाजपा विधायकों Randhir Sharma और Tarlok Jamwal ने जोर देकर कहा था कि मूल अधिनियम में सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य था और यही व्यवस्था पारदर्शिता तथा श्रमिक हितों की बेहतर निगरानी सुनिश्चित करती है। उनका मत था कि कर्मचारियों की संख्या के आधार पर छूट से निगरानी कमजोर हो सकती है।
सरकार का स्पष्ट रुख
सरकार ने तब भी और अब भी यह स्पष्ट किया है कि संशोधन के तहत केवल 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों के लिए ही अनिवार्य पंजीकरण रखा गया है। मंत्री हर्षवर्धन चौहान के अनुसार, यह बदलाव छोटे दुकानदारों और पारिवारिक कारोबारों पर अनुपालन का बोझ घटाने के लिए किया गया है, जबकि बड़े प्रतिष्ठानों पर श्रम कानूनों की निगरानी पूर्ववत रहेगी।
कारोबारियों और श्रमिकों पर असर
आज इस विधेयक को “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। छोटे व्यवसायों को राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं संगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों के अधिकारों की निगरानी को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने का दावा सरकार कर रही है।
कुल मिलाकर, भले ही यह विधेयक 4 दिसंबर को पारित हो चुका हो, लेकिन आज की तारीख में इसके प्रावधान, प्रभाव और संभावित क्रियान्वयन को लेकर चर्चा और समीक्षा लगातार जारी है।














