संपादकीय।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति इन दिनों जनहित से अधिक राजनीतिक गलियारों की गूंज में उलझी दिखाई देती है। सवाल मूल रूप से सरल है—हिमाचल के संसाधन किसके लिए हैं? जवाब भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए—हिमाचल के लिए, यहां की जनता के लिए। लेकिन व्यवहार में तस्वीर कुछ और ही बयां करती है। कथित तौर पर कुछ अधिकारी अपने हितों के लिए राजनीति करने लगे हैं, निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं और व्यवस्था को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यही वह बिंदु है, जहां स्वस्थ लोकतंत्र और बेलगाम अफसरशाही के बीच टकराव उभरता है।
लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बयान को लेकर जो राजनीतिक घमासान मचा, उसने कई परतें खोल दीं। यह बात विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष द्वारा कही गई थी, मंडी में उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने मुख्यमंत्री के समक्ष रखी थी—फिर भी जब वही सवाल सार्वजनिक विमर्श में आया, तो सरकार के भीतर ही अलग-अलग सुर सुनाई देने लगे। मंत्री जगत सिंह नेगी, अनिरुद्ध सिंह जैसे नेताओं की प्रतिक्रियाएं यह संकेत देती हैं कि मामला केवल अफसरशाही का नहीं, बल्कि सरकार के भीतर समन्वय की कमी का भी है। अनिरुद्ध सिंह का यह कहना मंत्री की कार्यक्षमता पर ही प्रश्नचिह्न लग रहा है, राजनीतिक बहस को व्यक्तिगत स्तर तक खींच ले जाता है।
इस आपसी खींचतान में सबसे बड़ा नुकसान आम जनता का हो रहा है। क्या जनता के हित में यह जरूरी है कि मंत्री और अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में उलझे रहें? या फिर राजनीतिक गलियारों में कोई अलग ही पटकथा लिखी जा रही है—जहां किरदार, संवाद और संघर्ष सब सत्ता के भीतर वर्चस्व की लड़ाई तय कर रहे हैं? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य पहले से ही चुनौतियों से जूझ रहा है।
आर्थिक तंगी, कर्मचारियों और पेंशनरों के भुगतान की समस्या, 11 प्रतिशत से अधिक महंगाई भत्ता, आपदा के बाद भी बदहाल सड़कें, बंद पड़ा यातायात और अस्थिर प्रशासनिक व्यवस्था—ये सब हिमाचल की जमीनी हकीकत हैं। ऐसे समय में यदि सरकार का ध्यान अंतर्कलह और बयानबाजी में बंटा रहेगा, तो विकास और जनसुविधाएं स्वाभाविक रूप से हाशिये पर चली जाएंगी।
मूल प्रश्न यही है—क्या कांग्रेस की वर्तमान सरकार के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक है, या फिर भीतर ही भीतर कोई और कहानी पक रही है? क्या अफसरशाही पर राजनीतिक नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है, या राजनीति खुद अफसरशाही की ढाल बनती जा रही है? यह केवल सत्ता के गलियारों की चर्चा नहीं, बल्कि शासन की दिशा तय करने वाला मुद्दा है।
हिमाचल की जनता को बयान नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें सत्ता के भीतर चल रही ‘बचाव-रणनीतियों’ से कोई सरोकार नहीं, बल्कि एक ऐसी सरकार चाहिए जो अफसरशाही को अनुशासन में रखे, मंत्रियों में सामंजस्य बनाए और जनहित को सर्वोपरि रखे। वरना राजनीतिक वर्चस्व की यह लड़ाई न केवल सरकार की साख को नुकसान पहुंचाएगी, बल्कि हिमाचल के विकास की रफ्तार को भी धीमा कर देगी।





























