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लोकतंत्र पर विराम और सत्ता की परीक्षा

संपादकीय।
हिमाचल प्रदेश में पंचायतों और स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त हो जाना और इसके बावजूद चुनाव प्रक्रिया का आगे न बढ़ पाना अब केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक सवाल बन चुका है। स्थानीय स्वशासन, जिसे लोकतंत्र की जड़ और उसकी सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है, आज असमंजस और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है।
निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों की जगह प्रशासकीय व्यवस्था के सहारे शासन चलाना भले ही अस्थायी समाधान के रूप में पेश किया जा रहा हो, लेकिन इसका संदेश साफ है—जनता की सीधी भागीदारी से दूरी। प्रशासक न तो जनता के जनादेश से बंधे होते हैं और न ही गांव-गांव की ज़मीनी हकीकत से। ऐसे में विकास की प्राथमिकताएं और आम लोगों की जरूरतें फाइलों और बैठकों तक सिमट कर रह जाती हैं।
इसी संदर्भ में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि 30 अप्रैल से पहले पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव कराए जाएं। यह आदेश केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में दिया गया एक सख्त और स्पष्ट संदेश है—कि निर्वाचित संस्थाओं के बिना शासन व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब चुनाव कराना एक संवैधानिक जिम्मेदारी है और इसका समय पहले से तय होता है, तो फिर तैयारियां समय रहते क्यों नहीं की गईं? क्या यह महज़ प्रशासनिक लापरवाही है या फिर राजनीतिक सुविधा के हिसाब से समय टालने की कोशिश? लोकतंत्र में ऐसी देरी को कभी भी साधारण संयोग नहीं माना जा सकता, इसके दूरगामी और गहरे राजनीतिक अर्थ होते हैं।
पंचायतें और स्थानीय निकाय केवल औपचारिक संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे गांव और कस्बों के विकास की रीढ़ होती हैं। विकास योजनाओं की निगरानी, सरकारी धन के सही उपयोग और आम जनता की समस्याओं के समाधान में इनकी भूमिका निर्णायक होती है। जब ये संस्थाएं निष्क्रिय हो जाती हैं, तो उसका सीधा असर जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। लोकतंत्र की आत्मा विकेंद्रीकरण में बसती है, लेकिन मौजूदा हालात सत्ता के केंद्रीकरण की ओर इशारा करते नजर आ रहे हैं।
अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है। उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना केवल एक कानूनी मजबूरी नहीं, बल्कि यह साबित करने का मौका भी है कि सरकार के लिए लोकतंत्र कोई बोझ नहीं, बल्कि उसकी मौलिक जिम्मेदारी है।
हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक परंपरा रही है कि यहां की जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर हमेशा सजग और संवेदनशील रही है। अब सवाल यही है—क्या सत्ता समय रहते इस चेतावनी को समझेगी, या फिर प्रदेश में लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के लिए बार-बार अदालतों का सहारा लेना पड़ेगा?

मुकेश संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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