हिमाचल प्रदेश में आई इस वर्ष की भीषण आपदा ने जहाँ पूरे प्रदेश में कहर बरपाया, वहीं सबसे अधिक तबाही बंजार विधानसभा क्षेत्र में देखने को मिली। पाँच महीने बीत जाने के बावजूद बंजार के लोग आज भी टूटी सड़कों, ढहे मकानों और उखड़ी हुई ज़मीनों के बीच अपने जीवन को दोबारा संभालने की कोशिश में संघर्ष कर रहे हैं। सदन में इस विषय को उठाते हुए बंजार के विधायक ने प्रदेश सरकार की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े किए और विस्तृत आँकड़ों के साथ बंजार की जमीनी हकीकत सामने रखी।
प्रदेश में आई आपदा के दौरान 468 लोगों की मौत, लगभग 1800 मकान पूरी तरह ध्वस्त और 8000 से ज्यादा मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। लेकिन बंजार विधानसभा क्षेत्र में यह तबाही कई गुना अधिक गहरी और दर्दनाक रही। विधायक के अनुसार अकेले बंजार में 415 मकान पूरी तरह गिर गए, जबकि 812 मकान आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। इसके अतिरिक्त 322 गौशालाएं, 61 दुकानें व ढाबे उजड़ गए और करीब 1000 बीघा कृषि भूमि भूस्खलन की चपेट में आकर पूरी तरह नष्ट हो गई। कई परिवार जिन्होंने पीढ़ियों से खेती का सहारा लिया था, आज उनके पास न खेत बचा है न घर।
सैंज खड्ड से लेकर तीर्थन घाटी तक पहाड़ों के दरकने और जमीन के खिसकने ने पूरे क्षेत्र का मानचित्र बदल दिया है। सैंज क्षेत्र में 80 मकान, मतला गांव में 30 मकान, और तीर्थन घाटी के बांदल गांव सहित कई बस्तियाँ पूरी तरह ध्वस्त हो गईं। गडसा क्षेत्र का शेगलीधार, दोधार, शोघी और मोंदे—सभी गाँव प्राकृतिक कहर के बीच टूट चुके हैं। कई जगहों पर पहाड़ी ऐसे खिसकी कि पूरा गाँव मानो धरती में समा गया हो।
आपदा के तुरंत बाद ग्रामीणों ने अपने स्तर पर टूटी राहों और ध्वस्त पुलों की मरम्मत कराने की मांग पंचायतों के माध्यम से प्रशासन तक पहुँचाई। एसडीएम और उपायुक्त कार्यालयों को सड़कों, पुलों और सुरक्षा दीवारों के मरम्मत एस्टीमेट नियमित रूप से भेजे गए। लेकिन विधायक ने सदन में साफ कहा कि आज तक बंजार क्षेत्र की ग्रामीण सड़कों के लिए कोई बजट जारी नहीं हुआ। कई गाँव आज भी बाहरी दुनिया से कटे हुए हैं, जहाँ पहुँचने के लिए लोग जोखिम भरे अस्थाई रास्तों का सहारा ले रहे हैं।
सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया कि 400 से अधिक परिवारों के बेघर होने के बावजूद न मुख्यमंत्री और न ही कोई वरिष्ठ मंत्री बंजार के दौरे पर पहुँचा। विधायक ने कहा कि पहाड़ों में जब पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया, लोग घरों से बाहर सड़कों पर आ गए, तब नेतृत्व की सबसे ज़्यादा आवश्यकता थी, लेकिन सरकार की ओर से संवेदनशीलता के बजाय खामोशी दिखाई दी। यही कारण है कि स्थानीय लोगों का विश्वास व्यवस्था पर से डगमगा गया है।
स्थानीय अख़बारों ने भी बंजार की दुर्दशा को बार-बार उजागर किया है। ‘अमर उजाला’ में छपी रिपोर्ट में लिखा गया—“बाढ़ ने पुल तोड़ा, सिस्टम पर से भरोसा भी टूट गया”। रिपोर्ट में बताया गया कि तीन से पाँच महीने बीत जाने के बावजूद कई जगहों पर सुरक्षा दीवारें, पुल और ग्रामीण सड़कें अभी तक बहाल नहीं हुई हैं। लोग रोज़ाना जान जोखिम में डालकर क्षतिग्रस्त राहों से गुजरते हैं, जबकि राहत और पुनर्निर्माण का कोई ठोस ढांचा ज़मीन पर दिखाई नहीं देता।
आज बंजार का सबसे बड़ा दर्द यह है कि लोगों के घर के साथ उनका विश्वास भी टूट गया है। कई परिवार तिरपालों और अस्थाई घरों में रह रहे हैं, जबकि सर्दी लगातार बढ़ रही है। जिनके खेत बह गए, उन्होंने आजीविका का आधार भी खो दिया है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और दैनिक जीवन का हर पहलू संकट की स्थिति में है।
विधायक ने सदन में मांग की कि बंजार विधानसभा क्षेत्र को पुनर्वास और पुनर्निर्माण योजनाओं में शीर्ष प्राथमिकता दी जाए, सड़क मरम्मत का बजट तुरंत जारी किया जाए और विस्थापित परिवारों के लिए विशेष मदद सुनिश्चित की जाए। उन्होंने यह भी आग्रह किया कि सरकार खुद मौके पर जाकर स्थिति का आकलन करे, ताकि प्रभावित लोगों को यह महसूस हो कि उनकी पीड़ा सुनी जा रही है।
बंजार आज भी पिछले पाँच महीनों की आपदा से उठे मलबे के ढेरों के बीच खड़ा है, लेकिन उसकी उम्मीद अब भी शासन से जुड़ी है। लोगों की सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि सरकार उनकी आवाज़ सुने, राहत कार्यों को गति दे और एक बार फिर जीवन को पटरी पर लाने में मदद करे।




























