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ले-आऊट से ही तय होगी बगीचे की तक़दीर: बारिश-बर्फबारी के बाद बागवानी विभाग की सख़्त एडवाइजरी, गलत रोपण से होगा सालों का नुकसान

फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला। तीन महीने से अधिक चले सूखे के बाद बारिश और बर्फबारी से प्रदेश की मिट्टी में जान लौटी है और इसी के साथ सेब व अन्य फलों के नए बगीचे लगाने का दौर शुरू हो गया है। लेकिन इस मौके पर बागवानी विभाग ने बागवानों को सख़्त चेतावनी के साथ साफ़ कर दिया है कि अब की गई ज़रा-सी लापरवाही आने वाले दशकों की पैदावार पर भारी पड़ सकती है। विभाग ने नए बगीचे लगाने से पहले सही ले-आऊट (रेखांकन) को अनिवार्य बताते हुए विस्तृत एडवाइजरी जारी की है।
विभाग के अनुसार, पौधों की दूरी रूट स्टॉक के हिसाब से तय करना बेहद ज़रूरी है। एम.एम. 111, एक. 7 और एम.एम. 106 के लिए पौधे से पौधे की दूरी 2 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर रखनी होगी, जबकि एम. 9 रूट स्टॉक में पौधे से पौधे की दूरी 1 मीटर और कतार से कतार की दूरी 3 मीटर निर्धारित की गई है। अधिकारियों का कहना है कि गलत दूरी पर लगाए गए पौधे न सिर्फ़ कमजोर रहते हैं, बल्कि कुछ ही सालों में पूरा बगीचा आर्थिक बोझ बन सकता है।


जहां मिट्टी अच्छी हो और पत्थर न हों, वहां 3 फुट गहरा और 3 फुट चौड़ा गड्ढा खोदने की सलाह दी गई है। गड्ढा खोदते समय ऊपर और नीचे की मिट्टी को अलग-अलग रखने और भराई के वक्त ऊपर की मिट्टी नीचे तथा नीचे की मिट्टी ऊपर डालने को कहा गया है, ताकि जड़ों को पोषक तत्व सही तरीके से मिल सकें। विभाग के मुताबिक, सही ले-आऊट और वैज्ञानिक तरीके से गड्ढा तैयार करने से ही जड़ें मजबूत बनती हैं और बगीचे की दीर्घकालीन उत्पादकता सुनिश्चित होती है।
बागवानी विशेषज्ञ डा. एस.पी. भारद्वाज ने कहा कि यह समय सेब के पौधे लगाने के लिए बेहद उपयुक्त है, लेकिन बागवानों को यह ज़रूर देखना चाहिए कि मिट्टी भुरभुरी हो, कीचड़ जैसी गीली न हो। उन्होंने चेताया कि अधिक पानी वाली मिट्टी में जड़ें आपस में चिपक जाती हैं, जिससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है और पूरा बगीचा कमजोर रह जाता है।
स्पष्ट है कि इस बार मौसम ने मौका दिया है, लेकिन अब बागवानों की समझ और सावधानी ही तय करेगी कि हिमाचल के बगीचे आने वाले वर्षों में समृद्ध होंगे या फिर एक और पीढ़ी गलतियों की क़ीमत चुकाएगी।

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