विश्लेषण।
हिमाचल प्रदेश के लिए 294 ग्रामीण सड़कों को मिली स्वीकृति पहली नज़र में राहत और उम्मीद की खबर लगती है। पहाड़ के गांवों के लिए सड़क सिर्फ़ डामर की पट्टी नहीं होती, वह अस्पताल तक पहुँच, स्कूल तक रास्ता और रोज़गार की संभावनाओं का द्वार होती है।

लेकिन हिमाचल का अनुभव यह भी सिखाता है कि फ़ाइलों में मिली मंज़ूरी और ज़मीन पर बनी सड़क के बीच की दूरी अक्सर खुद सड़क से भी लंबी निकलती है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत लगभग 1240 करोड़ रुपये की 142 परियोजनाओं को हरी झंडी मिलना इस बात का संकेत है कि ग्रामीण संपर्क को प्राथमिकता दी जा रही है। खास बात यह है कि शिमला ज़िले को सबसे ज़्यादा 97 सड़कों की स्वीकृति मिली है, जो क्षेत्रीय ज़रूरतों की सरकारी स्वीकारोक्ति मानी जानी चाहिए। पहाड़ी राज्य में सड़कें केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवनरेखा होती हैं—यह बात आंकड़ों से ज़्यादा ज़मीनी सच्चाई है।
लेकिन यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है। हिमाचल में हर सड़क अपने साथ भूस्खलन, भारी बारिश, बर्फ़बारी और भूगोल की कठोर चुनौतियाँ लेकर आती है। बीते वर्षों का रिकॉर्ड बताता है कि कई परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो पाईं, और कई जगहों पर गुणवत्ता से समझौता हुआ। नतीजा—कुछ सड़कें बनने के कुछ ही महीनों में जवाब दे गईं और कुछ काग़ज़ों में ही दौड़ती रहीं।
सवाल सिर्फ़ पैसा मंज़ूर होने का नहीं, बल्कि उसके सही और पारदर्शी इस्तेमाल का है। यदि निगरानी व्यवस्था मज़बूत नहीं हुई, और ठेकेदारों व अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ये योजनाएँ भी पिछली कई घोषणाओं की तरह अधूरी उम्मीद बनकर रह सकती हैं। पहाड़ में एक खराब सड़क का मतलब सिर्फ़ असुविधा नहीं, बल्कि कई बार जान का जोखिम भी होता है।
विकास की असली पहचान उद्घाटन पट्टिकाओं या प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं होती, बल्कि उस दिन से होती है जब कोई गांव साल भर सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से जुड़ जाता है। अगर ये 294 सड़कें समय पर, टिकाऊ गुणवत्ता के साथ ज़मीन पर उतरती हैं, तो इससे न सिर्फ़ पलायन रुकेगा, बल्कि लोगों का सिस्टम पर भरोसा भी बढ़ेगा। वरना यह भी एक और घोषणा बनकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगी—जिसकी कीमत हमेशा की तरह पहाड़ और उसके लोग चुकाएँगे।




























