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आज भी जीवित है पुरातन देव परंपरा — सराज घाटी का ‘हरण स्वांग’ बना लोक संस्कृति का प्रतीक VIDEO

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चांदनी रात में मशालों की रोशनी संग गूंजता है लोक नाट्य — बुजुर्गों को सुकून, नई पीढ़ी को सीख

कुल्लू। देवभूमि हिमाचल अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए जानी जाती है। हर जिला, हर घाटी, अपनी अलग लोक नाट्य शैली से अपनी पहचान बनाए हुए है। इन्हीं में से एक है सराज घाटी — जहाँ की लोक नाट्य परंपरा और “हरण स्वांग” आज भी प्राचीन संस्कृति की जीवंत मिसाल है।

पुरातन काल से चली आ रही यह परंपरा अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के दौरान विशेष रूप से देखने को मिलती है। जब घाटी के देवता अपने गांवों से दशहरे में भाग लेने कुल्लू के लिए रवाना होते हैं, तब बंजार उपमंडल में सात दिन तक यह पारंपरिक नृत्य “हरण स्वांग” बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाता है।

हरण स्वांग — चांदनी रात में संस्कृति की झिलमिलाती छवि

प्राचीन काल में स्वांग को मनोरंजन का सबसे श्रेष्ठ माध्यम माना जाता था। सराज घाटी में आज भी यह परंपरा जिंदा है।
“हरण स्वांग” का आयोजन चांदनी रात में किया जाता है, जहां मशालों की रोशनी में लोक कलाकार नृत्य करते हैं। दो व्यक्ति आगे-पीछे मिलकर हिरण का रूप धारण करते हैं। वे अपने ऊपर काले और सफेद रंग के पट्टू डालते हैं तथा सिर पर लकड़ी और हिरण के सींग बांधते हैं।
उनके साथ अन्य लोक कलाकार भी बाध्य यंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं। यह दृश्य न केवल लोक संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि देवभूमि के हर गांव की जीवंत आत्मा को दर्शाता है।

विविध लोक नाट्य परंपराएँ — संस्कृति का विस्तृत संसार

सराज घाटी की नाट्य परंपरा दर्जनों श्रेणियों में विभाजित है। इनमें प्रमुख हैं —
हरण स्वांग, रामलीला, देऊ खेल, चंद्रावली, श्राणी, बीहठ, फागली झीरू, मंडवाल, शोपरी स्वांग और फागुली।
इनमें “हरण स्वांग” अपनी विशिष्टता और लोकप्रियता के कारण सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

संस्कृति से जुड़ा सामाजिक भाव — अनाज से बनती है लोक धाम

यह नृत्य मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि समाजिक सहयोग और एकता की भावना को भी दर्शाता है।
हरण स्वांग के कलाकार जब गांव-गांव घूमते हैं, तो लोग उन्हें पैसे या अनाज देते हैं।
सातवें दिन इस एकत्रित अनाज को बेचकर उससे प्राप्त धन से सभी ग्रामीण एक स्थान पर एकत्रित होकर धाम या हलवा बनाते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।
यह परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी बंजार व कुल्लू घाटी की 36 पंचायतों में हर्षोल्लास के साथ निभाई जा रही है।

बुजुर्गों को सुकून, नई पीढ़ी को प्रेरणा

पुरानी संस्कृति को जीवंत देखकर घाटी के बुजुर्गों को अपार सुकून मिलता है। उनका कहना है कि यह परंपरा हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखती है और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का भाव सिखाती है।
भले ही आधुनिकता ने जीवनशैली में बदलाव लाया हो, लेकिन “हरण स्वांग” जैसे लोक नाट्य आज भी हमारी पहचान, परंपरा और आत्मा को संजोए हुए हैं।

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