फ्रंट पेज न्यूज़ दिल्ली।
क्या यह बाज़ार का खेल है या नीति की चूक?
जब चाँदी 15,000 रुपये उछलकर 3.85 लाख प्रति किलो और सोना रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जाए, और उसी समय रुपया डॉलर के मुक़ाबले 92 के करीब लुढ़क जाए, तो यह सिर्फ़ आर्थिक घटना नहीं रहती—यह राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था पर सीधा सवाल बन जाती है।

बाज़ार नहीं, भरोसा बोल रहा है
अर्थशास्त्र का एक सीधा नियम है—
जब जनता और निवेशकों का भरोसा डगमगाता है, तो पैसा उत्पादन से भागकर धातुओं में छिपता है।
आज सोना-चाँदी की यह तेज़ी बताती है कि
निवेशक शेयर बाज़ार से आश्वस्त नहीं हैं,
वैश्विक अस्थिरता से ज़्यादा डर घरेलू नीति की अनिश्चितता का है,
और रुपये पर दबाव केवल डॉलर की ताक़त से नहीं, नीतिगत कमज़ोरी से भी है।
रुपये की गिरावट: किसकी ज़िम्मेदारी?
सरकार अक्सर कहती है—“रुपये की कमजोरी वैश्विक कारणों से है।”
यह आधा सच है।
पूरा सच यह है कि—
बढ़ता व्यापार घाटा,
आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था,
विदेशी पूंजी का धीमा प्रवाह,
और चुनावी लोकलुभावन खर्च
रुपये को लगातार कमजोर कर रहे हैं।
कमज़ोर रुपया आर्थिक संप्रभुता की कमजोर होती दीवार है।
महँगाई का राजनीतिक सच
रुपया गिरता है → आयात महँगा होता है →
ईंधन, खाद्य तेल, दवाइयाँ महँगी होती हैं →
और अंततः मतदाता की जेब पर चोट पड़ती है।
लेकिन राजनीतिक विमर्श में—
सोना अमीरों का निवेश माना जाता है,
रुपये की गिरावट को तकनीकी शब्दों में ढक दिया जाता है,
और महँगाई को आंकड़ों में कैद कर दिया जाता है।
नीति बनाम प्रचार
सरकार की प्राथमिकता अगर
आर्थिक स्थिरता से ज़्यादा इवेंट और इमेज हो,
सुधारों से ज़्यादा घोषणाएँ हों,
और दीर्घकालिक नीति से ज़्यादा चुनावी गणित हो—
तो बाज़ार यही संदेश देता है:
“हम सुरक्षित जगह ढूँढ रहे हैं।”
और वही पैसा सोना-चाँदी में चला जाता है।
रिज़र्व बैंक की सीमाएँ
RBI के पास हथियार हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव भी हैं।
ब्याज दरें, विदेशी मुद्रा भंडार और हस्तक्षेप—
सबकी एक सीमा है।
जब राजनीति अर्थशास्त्र पर हावी हो, तो केंद्रीय बैंक भी अकेला पड़ जाता है।
निष्कर्ष: यह चेतावनी है, जश्न नहीं
सोना-चाँदी की रिकॉर्ड चमक और रुपये की गिरावट
आर्थिक सफलता की कहानी नहीं,
बल्कि नीतिगत असंतुलन की चेतावनी है।
अगर इसे समय रहते नहीं समझा गया, तो
चमकते चार्ट के नीचे
कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था की दरारें
और गहरी होंगी।
राजनीति अगर अर्थव्यवस्था से आँख मिलाने का साहस नहीं करेगी,
तो बाज़ार सच बोलता रहेगा।




























