पेरिस/नई दिल्ली।
15 वर्ष से कम उम्र पर सोशल मीडिया प्रतिबंध; भारत में उम्र सीमा और निगरानी पर बहस जारी
जहां फ्रांस ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर निर्णायक कदम उठाते हुए 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध को मंजूरी दे दी है, वहीं भारत में इस विषय पर अब भी नीति, कानून और अमल को लेकर स्पष्टता का अभाव नजर आता है।

फ्रांस का यह फैसला वैश्विक डिजिटल नियमन की दिशा में एक मजबूत उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
फ्रांस की नेशनल असेंबली ने भारी बहुमत से विधेयक पारित करते हुए न केवल सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम आयु सीमा तय की है, बल्कि स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर भी सख्त रोक का प्रावधान किया है। सरकार का तर्क है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई और सामाजिक व्यवहार पर सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए यह हस्तक्षेप आवश्यक था।

इसके विपरीत, भारत में सोशल मीडिया के उपयोग को लेकर कोई स्पष्ट न्यूनतम आयु कानून प्रभावी रूप से लागू नहीं है। आईटी नियम 2021 और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट बच्चों की सुरक्षा का उल्लेख तो करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सीधी उम्र-आधारित रोक या स्कूल स्तर पर राष्ट्रीय नीति अब भी स्पष्ट नहीं है। व्यवहार में बच्चे आसानी से फर्जी उम्र दर्ज कर प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच बना लेते हैं।
नीति बनाम अमल की खाई
फ्रांस में जहां राज्य ने जिम्मेदारी लेते हुए प्लेटफॉर्म्स और संस्थानों पर जवाबदेही तय की है, वहीं भारत में जिम्मेदारी अक्सर अभिभावकों और स्कूलों पर छोड़ दी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अंतर नीति की प्राथमिकताओं को दर्शाता है—एक ओर राज्य-नेतृत्वित नियमन, दूसरी ओर आत्म-नियमन पर भरोसा।
भारत के लिए सबक
डिजिटल विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रांस का मॉडल भारत के लिए चेतावनी और अवसर दोनों है। चेतावनी इसलिए कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों पर डिजिटल दुष्प्रभाव गहराते जाएंगे; और अवसर इसलिए कि भारत अभी संतुलित, व्यावहारिक और लागू करने योग्य नीति बना सकता है।
फ्रांस का फैसला अब केवल एक राष्ट्रीय कानून नहीं, बल्कि वैश्विक बहस का संदर्भ बिंदु बन चुका है—सवाल यह है कि क्या भारत भी बच्चों की डिजिटल दुनिया को सुरक्षित करने के लिए उतनी ही राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा पाएगा?




























