संपादकीय।
“देवभूमि” कहलाने वाला हिमाचल प्रदेश आज एक कड़वे यथार्थ से जूझ रहा है। जो पहचान कभी शांति, प्रकृति और सरल जीवन से जुड़ी थी, वही प्रदेश अब “चिट्टा” जैसे घातक नशे के कारण राष्ट्रीय चर्चा में है। एक समय पंजाब के संदर्भ में प्रचलित शब्द “उड़ता पंजाब” आज हिमाचल के लिए भी इस्तेमाल होने लगा है, और यह महज़ एक जुमला नहीं बल्कि सामाजिक चेतावनी है।
गांव-गांव, शहर-शहर चिट्टे की पहुंच यह बताती है कि नशा अब सीमित वर्ग या स्थान तक नहीं रहा। युवा, मजदूर, छात्र, यहां तक कि मध्यम वर्गीय परिवार भी इसकी चपेट में हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि चिट्टे के उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि इसके कारोबारी नेटवर्क में वे लोग भी शामिल पाए जा रहे हैं जिन पर कानून की रक्षा की जिम्मेदारी है। एक पुलिस इंस्पेक्टर, कई पुलिस जवानों, बिजली विभाग के कर्मचारी की संलिप्तता और नकदी व चिट्टे की बरामदगी — यह केवल अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था पर गहरा धब्बा है।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि समस्या सिर्फ कानून-व्यवस्था की नहीं, बल्कि संस्थागत नैतिकता के क्षरण की भी है। जब नशे का नेटवर्क वर्दी और सरकारी तंत्र के भीतर तक पैठ बना ले, तब साधारण पुलिसिया कार्रवाई पर्याप्त नहीं रह जाती। तब सवाल उठता है — क्या हम नशे के खिलाफ लड़ाई जीत रहे हैं, या केवल आंकड़े बढ़ा रहे हैं?
सरकार द्वारा “जीरो टॉलरेंस” की घोषणाएं, गिरफ्तारियां और संसाधनों की तैनाती निश्चित रूप से आवश्यक कदम हैं, लेकिन ये तब तक निर्णायक सिद्ध नहीं होंगी जब तक आंतरिक शुद्धिकरण, पारदर्शिता और सख्त जवाबदेही सुनिश्चित न हो। दोषी चाहे किसी भी पद पर हो, उसे सार्वजनिक और त्वरित दंड मिलना चाहिए, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि कानून सबके लिए समान है।
साथ ही, इस संकट को केवल पुलिस या सरकार की जिम्मेदारी मान लेना भी एक भूल होगी। नशा सामाजिक मांग के बिना नहीं पनपता। बेरोजगारी, दिशाहीनता, त्वरित धन की चाह और सामाजिक चुप्पी — ये सभी चिट्टे के फैलाव को खाद देते हैं। जब तक परिवार, शिक्षण संस्थान, पंचायतें और समाज मिलकर हस्तक्षेप नहीं करेंगे, तब तक यह जहर नई नसों में फैलता रहेगा।
आज जरूरत है कि हिमाचल केवल “ड्रग-फ्री” नारा न लगाए, बल्कि ड्रग-फ्री संस्कृति विकसित करे — जहां सूचना देने वाला सुरक्षित हो, नशे का शिकार अपराधी नहीं बल्कि मरीज समझा जाए, और तस्कर के लिए कोई सामाजिक या संस्थागत संरक्षण न बचे।
यदि समय रहते निर्णायक, ईमानदार और सामूहिक कदम नहीं उठाए गए, तो “उड़ता हिमाचल” केवल शब्द नहीं रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर एक स्थायी प्रश्नचिह्न बन जाएगा। देवभूमि को नशे की धरती बनने से रोकना आज केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।















