धर्म परिवर्तन के नाम पर आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त चेतावनी
संपादकीय।
भारत की आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय की रीढ़ है, लेकिन जब इसी व्यवस्था को धर्म परिवर्तन के रास्ते शॉर्टकट बनाकर भुनाने की कोशिश होने लगे, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी—कि “धर्म बदलकर अल्पसंख्यक आरक्षण लेना नए किस्म का फर्जीवाड़ा हो सकता है”—केवल एक मामले पर टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है।
कोर्ट का सवाल, सिस्टम के कटघरे में
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार से यह पूछकर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है कि
अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र किन नियमों के तहत जारी हो रहे हैं,
क्या इसके लिए कोई स्पष्ट और एकरूप गाइडलाइंस हैं,
और क्या यह प्रक्रिया संविधान की भावना के अनुरूप है?
यह सवाल केवल प्रशासन से नहीं, बल्कि उस सोच से भी है जो आरक्षण को अधिकार नहीं, अवसरवाद का औज़ार समझने लगी है।
सामाजिक न्याय बनाम पहचान की राजनीति
अदालत ने याचिकाकर्ताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करते हुए यह संकेत दिया कि
यदि कोई व्यक्ति सामाजिक रूप से सामान्य वर्ग से आता है, तो मात्र धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे अल्पसंख्यक कोटे का लाभ देना संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ हो सकता है।
यह टिप्पणी उस बढ़ती प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है, जहाँ
पहचान बदली जाती है, लेकिन सामाजिक हैसियत नहीं।
संविधान क्या कहता है?
संविधान हर नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है—इसमें कोई संदेह नहीं।
लेकिन संविधान यह भी कहता है कि
आरक्षण वंचना की भरपाई के लिए है,
न कि सुविधा हासिल करने की चाल के लिए।
यदि धर्म परिवर्तन केवल सरकारी लाभों तक पहुँचने का माध्यम बन जाए, तो यह न केवल आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि वास्तविक रूप से पिछड़े वर्गों के हक़ पर भी डाका है।
राज्यों के लिए स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट का रुख़ साफ़ है—
अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह होनी चाहिए,
दिशानिर्देश स्पष्ट हों,
और किसी भी तरह के दुरुपयोग पर सख़्त रोक लगे।
अब यह ज़िम्मेदारी राज्यों की है कि वे इस चेतावनी को फाइलों में नहीं, नीतियों में उतारें।
निष्कर्ष: आस्था पवित्र है, सौदे का विषय नहीं
धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, लेकिन
आरक्षण सौदेबाज़ी का नहीं, सामाजिक न्याय का साधन है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी एक याद दिलाने वाली रेखा है—
अगर इसे अनदेखा किया गया, तो आरक्षण व्यवस्था पर लोगों का विश्वास ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।
सामाजिक न्याय वही है, जो सही व्यक्ति तक पहुँचे—बिना छल, बिना दिखावे।





























