फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा में धारा 118 में संभावित संशोधन की चर्चा ने पूरे प्रदेश में गहरी बेचैनी और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। जिस संवैधानिक प्रावधान ने दशकों तक हिमाचल की ज़मीन, किसानों और पहाड़ी पहचान को बाहरी दबाव से सुरक्षित रखा, आज उसी को कमजोर करने की कोशिशें की जा रही हैं। गैर-हिमाचली लोगों को बिना कृषक प्रमाण पत्र के ज़मीन खरीदने की छूट देने का प्रस्ताव केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि हिमाचल की अस्मिता और भविष्य पर सीधा हमला माना जा रहा है।
धारा 118 कोई साधारण कानून नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी राज्य के लिए सुरक्षा कवच रही है। इसने बड़े पूंजीपतियों, रियल एस्टेट माफिया और कॉरपोरेट दबाव से हिमाचल की सीमित और संवेदनशील भूमि को बचाए रखा। अब यदि इस ढाल को हटाया गया, तो इसका सीधा अर्थ होगा—हिमाचल की ज़मीन को खुले बाज़ार में सौदे की वस्तु बना देना। सरकार भले ही इसे “विकास” का नाम दे रही हो, लेकिन सवाल यह है कि यह विकास किसके लिए है?
क्या यह उस किसान का विकास है, जो पहले ही महंगाई, प्राकृतिक आपदाओं और घटती खेती से जूझ रहा है?
या फिर उन बिल्डरों और कंपनियों का, जिनकी नज़र पहाड़ों की हर इंच ज़मीन पर टिकी हुई है?
अनुभव क्या कहता है ?
देश के अन्य राज्यों और पहाड़ी क्षेत्रों का अनुभव गवाह है कि जहां-जहां भूमि कानूनों को ढीला किया गया, वहां स्थानीय लोग धीरे-धीरे अपनी ज़मीन खोकर मज़दूर बनते चले गए। ज़मीन कुछ गिने-चुने धनाढ्य लोगों के हाथों में सिमट गई। यदि धारा 118 में यह संशोधन लागू होता है, तो आने वाले वर्षों में हिमाचली अपने ही राज्य में किराएदार बनने को मजबूर हो सकते हैं।
पर्यावरण पर मंडराता खतरा
पर्यावरण की दृष्टि से यह फैसला और भी भयावह साबित हो सकता है। हिमाचल पहले से ही भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ और जल संकट जैसी आपदाओं से जूझ रहा है। पहाड़ों पर अनियंत्रित निर्माण का मतलब है—और अधिक तबाही, विस्थापन और जान-माल का नुकसान। विकास के नाम पर यदि प्रकृति को कुचला गया, तो इसका खामियाज़ा केवल आज नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा।
विशेषज्ञों और समाज के प्रबुद्ध वर्ग की आवाज़

Guman Singh
हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह का मानना है कि धारा 118 जैसे संवेदनशील विषय को विभागीय समितियों तक सीमित रखने के बजाय समाज के हर वर्ग के साथ खुले मंच पर चर्चा के लिए रखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक मुद्दा बताया और याद दिलाया कि यह प्रावधान पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. परमार की दूरदर्शी सोच का परिणाम रहा है।

ENVI (सेवर्स ऑफ एनवायरनमेंट) के चीफ एडवाइजर बी.एस. राणा का कहना है कि धारा 118 में छेड़छाड़ से “पहाड़, पहाड़ नहीं रहेंगे बल्कि कंक्रीट के जंगल में बदल जाएंगे।” उनके अनुसार इससे अंधाधुंध निर्माण बढ़ेगा, जंगलों की कटाई होगी, जलस्रोत नष्ट होंगे और हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जो प्रदेश की पहचान है, गंभीर संकट में पड़ जाएगी।

बार एसोसिएशन, जिला कुल्लू के अध्यक्ष तेजा सिंह ठाकुर का मानना है कि यदि छोटे से हिमाचल प्रदेश की ज़मीन पैसे के लालच में बिकती चली गई, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल केसरी चौहान ने सवाल उठाया—“आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि हिमाचल के हितों से समझौता किया जाए ?लालच नहीं संरक्षण की आवश्यकता है।

वहीं, सेवानिवृत्त पर्यटन अधिकारी एवं समाजसेवी हेमराज शर्मा का कहना है कि हिमाचल का जल, जंगल और ज़मीन तभी सुरक्षित रह सकते हैं, जब इन्हें बेचने की प्रवृत्ति पर सख्ती से रोक लगे। अनियंत्रित विकास प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को कई गुना बढ़ा देगा।

पूर्व आईजी ओंकार ठाकुर का कहना है कि हिमाचल जनजातीय क्षेत्र विशेष नियमों से सुरक्षित है उसी प्रकार हिमाचल प्रदेश को धारा 118 के तहत सुरक्षित रखना हिमाचली हित में है इससे हमारी प्राकृतिक धरोहर और संस्कृति बची रहेगी।
जन-संवाद क्यों ज़रूरी है?
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतना बड़ा और दूरगामी असर डालने वाला फैसला व्यापक जन-संवाद के बिना लेने की कोशिश हो रही है। पंचायतें, किसान संगठन, पर्यावरणविद् और आम नागरिक खुद को इस प्रक्रिया से बाहर महसूस कर रहे हैं। यह लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।
धारा 118 में संशोधन केवल एक कानून बदलने का सवाल नहीं है। यह तय करेगा कि भविष्य में हिमाचल हिमाचलियों का रहेगा या बाज़ार का माल बन जाएगा। विकास की ज़रूरत से कोई इनकार नहीं, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो ज़मीन, संस्कृति और अस्तित्व को ही निगल जाए।
धारा 118 से छेड़छाड़ का मतलब है—हिमाचल की जड़ों पर वार। और जब जड़ें कटती हैं, तो पहाड़ भी खड़े नहीं रह पाते।




























