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रिश्वतखोरी: व्यवस्था का सबसे ईमानदार सच

संपादकीय।
यदि भारत में किसी “प्रणाली” ने बिना किसी योजना आयोग, बिना बजट आवंटन और बिना सरकारी विज्ञापन के सबसे तेज़ और स्थायी विकास किया है, तो वह है — रिश्वतखोरी। यह वह समानांतर व्यवस्था है जो हर सरकार में फलती-फूलती है, हर शासन में जड़ें जमाए रखती है और हर विभाग में बिना किसी भय के अपना कर वसूलती है।
आज सरकारी दफ्तर सेवा केंद्र नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी के बाज़ार बन चुके हैं। यहाँ काम का मूल्य नियम और कानून से नहीं, बल्कि “रेट लिस्ट” से तय होता है। फाइलें योग्यता देखकर नहीं, नोट देखकर आगे बढ़ती हैं। ईमानदारी यहाँ योग्यता नहीं, बल्कि कमजोरी समझी जाती है और जो नागरिक बिना रिश्वत अपना काम करवाना चाहता है, उसे या तो मूर्ख माना जाता है या महीनों तक घुमाया जाता है।
जब कानून के रक्षक ही सौदागर बन जाएँ, तो न्याय भी मोलभाव की वस्तु बन जाता है। थाने हों, तहसील हों या सचिवालय — हर जगह व्यवस्था का एक ही मौन संदेश है: “भुगतान कीजिए, सुविधा पाइए।” यहाँ दोषी और निर्दोष का अंतर नहीं, सिर्फ देने वालों और न देने वालों की श्रेणी है।
रिश्वतखोरी ने देश की सबसे खतरनाक हत्या की है — योग्यता की हत्या। योग्य व्यक्ति लाइन में खड़ा रहता है और अयोग्य व्यक्ति रास्ता खरीद लेता है। फिर यही अयोग्य सिस्टम का हिस्सा बनकर घटिया नीतियाँ बनाता है, घटिया निर्माण करवाता है और घटिया फैसले देता है। इसके बाद सरकारें आश्चर्य जताती हैं कि योजनाएँ फेल क्यों हो रही हैं और प्रशासन क्यों चरमरा रहा है।
सबसे दुखद और खतरनाक पहलू यह है कि अब समाज ने इस बुराई को स्वीकार कर लिया है।
“सब जगह देना पड़ता है” — यह वाक्य अब शिकायत नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान का प्रमाण बन चुका है। माता-पिता अपनी संतानों को यह सिखा रहे हैं कि सिस्टम से लड़ो मत, उसे खरीदना सीखो।
सरकारें भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े नारे देती हैं। कानून बनते हैं, आयोग बनते हैं, अभियान चलते हैं। लेकिन कार्रवाई अक्सर वहाँ जाकर रुक जाती है जहाँ नाम भारी और कुर्सियाँ मजबूत होती हैं। छोटे कर्मचारी बलि का बकरा बनते हैं और बड़े खिलाड़ी व्यवस्था के “स्तंभ” बने रहते हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि रिश्वतखोरी कब खत्म होगी।
असल सवाल यह है कि क्या समाज इसे खत्म करना भी चाहता है?
क्योंकि सुविधा के लिए दिया गया हर नोट, इस व्यवस्था को और मजबूत करता है। जिस दिन नागरिक ने सामूहिक रूप से रिश्वत देने से इनकार कर दिया, उसी दिन यह समानांतर शासन ढह जाएगा।
लेकिन फिलहाल सच्चाई यह है कि — रिश्वतखोरी सिर्फ ज़िंदा नहीं है, बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ शासन कर रही है।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से

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