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“भारत में वन—आंकड़ों की सच्चाई और जिम्मेदारी का सवाल”

संपादकीय।

अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस 21 मार्च को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस हमें यह याद दिलाता है कि वनों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न भी है।


भारत सरकार की इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR 2023) के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आच्छादन लगभग 24.62% है। सुनने में यह आंकड़ा संतोषजनक लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पारिस्थितिक संतुलन के लिए यह कम से कम 33% होना चाहिए। यानी हम अभी भी लक्ष्य से काफी पीछे हैं।
चिंता का विषय यह भी है कि जहां एक ओर कुल हरित क्षेत्र में मामूली वृद्धि दर्ज की जाती है, वहीं घने प्राकृतिक वनों (Dense Forests) का क्षेत्र कई स्थानों पर घट रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों—जैसे अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड—में पिछले कुछ वर्षों में हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है। इसके पीछे प्रमुख कारण अवैध कटान, झूम खेती और बुनियादी ढांचा विकास है।
वनों के महत्व को केवल हरियाली तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। भारत की लगभग 275 मिलियन (27.5 करोड़) आबादी सीधे या परोक्ष रूप से वनों पर निर्भर है—चाहे वह ईंधन, चारा, औषधीय पौधे हों या आजीविका के अन्य साधन। ऐसे में वन संरक्षण सामाजिक न्याय से भी जुड़ा मुद्दा बन जाता है।

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जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी वनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत ने पेरिस समझौते के तहत यह लक्ष्य रखा है कि वह 2030 तक अतिरिक्त 2.5 से 3 बिलियन टन CO₂ का कार्बन सिंक वनों और वृक्षों के माध्यम से तैयार करेगा। लेकिन यदि वर्तमान दर से वन क्षरण जारी रहा, तो इस लक्ष्य को हासिल करना चुनौतीपूर्ण होगा।
दूसरी ओर, वन्यजीवों की स्थिति भी चिंताजनक है। मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले बढ़ रहे हैं, जो यह संकेत देते हैं कि प्राकृतिक आवास सिकुड़ रहे हैं। बाघ, हाथी और अन्य प्रजातियों के संरक्षण के लिए बनाए गए अभयारण्यों के बावजूद, उनके आसपास के क्षेत्रों में दबाव लगातार बढ़ रहा है।
यह स्पष्ट है कि केवल वृक्षारोपण के आंकड़े बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है गुणवत्ता आधारित वन संरक्षण की—जहां प्राकृतिक वनों को संरक्षित किया जाए, स्थानीय समुदायों को वन प्रबंधन में भागीदार बनाया जाए और विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता दी जाए।


सरकार की ग्रीन इंडिया मिशन और CAMPA फंड जैसी योजनाएं सकारात्मक पहल हैं, लेकिन इनकी प्रभावशीलता तभी सुनिश्चित होगी जब जमीनी स्तर पर पारदर्शिता और जनभागीदारी बढ़े।
अंततः, अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम केवल आंकड़ों की हरियाली में संतुष्ट हैं, या वास्तव में वनों के अस्तित्व को बचाने के लिए गंभीर हैं?

अचिंत्य कैंपिंग (जिभी)

(अपनी एडवर्टाइजमेंट देने के लिए 94180 20801 और 8894444378 पर संपर्क करें)


भारत के संदर्भ में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है—क्योंकि यहां वन केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और भविष्य का आधार हैं।
“यदि वन सुरक्षित हैं, तो भारत का कल सुरक्षित है।”

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