फ्रंट पेज न्यूज़ (बंजार)
सुबह की पहली किरण संग
नगर की गलियों में हलचल जागी,
दीवारों पर चिपके वादों ने
फिर से अपनी आवाज़ लगाई।
किसी वार्ड में आरक्षण की चर्चा,
कहीं दावेदारी की धीमी आहट,
नामों के पीछे भागती भीड़ में
जनता ढूंढे सच्ची राहत।
मैं भी निकला उसी भीड़ के बीच,
हाथ में उम्मीदों की एक पोटली,
सोचा—इस बार शायद
बदल जाएगी किस्मत की गठरी।
दोपहर तक भाषणों की धूप चढ़ी,
शब्दों के साये छोटे पड़ते गए,
वादों के पेड़ बहुत दिखे मगर
फल देने वाले कम ही लगे।
शाम ढली तो मन ने पूछा—
क्या सच में बदलेगा यह नगर?
या फिर वही चेहरे, वही रास्ते,
बस नारों का होगा नया सफर।
फिर भी भीतर एक दीप जला—
लोकतंत्र की धीमी सी लौ,
कि सही हाथों में जाए डोर
तो कल बेहतर होगा—यह संयोग।
एक दिन यूँ ही गुजर गया,
चुनावों की आहट के साथ,
उम्मीद और संशय के बीच
जनता फिर खड़ी है अपने हाथ।
एक दिन, चुनाव और उम्मीद

















