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बंजार की अनसुनी पुकार: विकास की मुख्यधारा से कब जुड़ेगा आंतरिक सराज?

फ्रंट पेज न्यूज़ (परमेश शर्मा,मुख्य संपादक)
सत्ता बदली, सरकारें बदलीं, लेकिन बंजार और आंतरिक सराज की किस्मत नहीं बदली — उपेक्षा अब व्यवस्था की पहचान बन चुकी है
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले का बंजार विधानसभा क्षेत्र, विशेषकर आंतरिक सराज, आज़ादी के सात दशक बाद भी विकास की दौड़ में वहीं खड़ा है, जहां से चलना था। सड़कें, पुल, सुरंग, पर्यटन ढांचा, शिक्षा, खेल और बुनियादी सुविधाएं—हर मोर्चे पर यह इलाका आज भी “प्रस्ताव” और “विचाराधीन” के बीच झूल रहा है। यह अब किसी एक सरकार या एक कार्यकाल की विफलता नहीं, बल्कि लगातार चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक उदासीनता की कहानी बन चुकी है।
सामाजिक कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त पर्यटन अधिकारी हेम राज शर्मा ने एक बार फिर पूरे तथ्यों के साथ इस उपेक्षा की परतें खोली हैं। उनका सवाल सीधा और असहज करने वाला है—जब हर सरकार विकास की बात करती है, तो आंतरिक सराज हर बार सूची के आख़िर में क्यों रह जाता है?
जलोड़ी दर्रे के नीचे प्रस्तावित यातायात सुरंग, जिसे आंतरिक सराज की जीवनरेखा कहा जाता है, 20-30 वर्षों से फाइलों में कैद है। एनएच-305 को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने से पहले उसे पूरी तरह चौड़ा करने का प्रस्ताव भी अधूरा पड़ा है। नतीजा यह है कि आम जनता, पर्यटन कारोबारी और पर्यटक—तीनों रोज़ जोखिम उठाकर सफर करने को मजबूर हैं।
पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद सरेउलसर झील, रघुपुर गढ़, बशलेउ दर्रा, तीर्थन घाटी जैसे क्षेत्रों में पहुंच मार्ग, शौचालय, पर्यटक सूचना केंद्र और परिवहन सुविधाएं आज भी अधूरी हैं। लारजी से जलोड़ी तक शौचालयों का अभाव और गुशेनी, जीभी, बठाहड़ में सार्वजनिक शौचालय तक न होना प्रशासन की प्राथमिकताओं पर करारा तमाचा है।
सड़कों और पुलों की हालत और भी चिंताजनक है। एनएच-305 के जर्जर छोटे पुल, बंजार-गुशेनी-बठाहड़ मार्ग, जयपुर-पलाच, गुशेनी-पेखड़ी, शर्ची जैसी सड़कों के ब्लैक स्पॉट, अधूरी लिंक सड़कें, बाढ़ में बहा औट पुल—ये सब केवल विकास का नहीं, सीधे-सीधे जन सुरक्षा का सवाल हैं। इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग और प्रशासन की गंभीरता सवालों के घेरे में है।
सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि कई गांवों के लोगों ने अपनी उपजाऊ ज़मीन तक दान कर दी, ताकि सड़क बने और भविष्य बदले—लेकिन वर्षों बाद भी उन्हें उसका लाभ नहीं मिला। युवाओं के लिए न पुस्तकालय हैं, न खेल मैदान—और फिर व्यवस्था ही पूछती है कि नशा क्यों बढ़ रहा है?
ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के विश्व धरोहर बनने के बाद बंजार क्षेत्र की करीब 14 पंचायतों के हजारों लोग प्रभावित हुए। उनके पारंपरिक हक-हकूक सिमट गए, लेकिन बदले में न तो ठोस पुनर्वास मिला, न ही पर्याप्त स्वरोज़गार। नतीजा यह है कि यहां का युवा गोवा, कर्नाटक और मनाली की तरफ पलायन करने को मजबूर है।
धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सवाल कम गंभीर नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा के दौरान देव परंपराओं के कारण सुरंगों का उपयोग नहीं किया जाता—तो फिर आंतरिक और बाहरी सराज के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक वैकल्पिक मार्ग क्यों नहीं बनाए गए?
पूछता है बंजार
क्या आंतरिक सराज सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाने वाला इलाका है?
क्या विकास केवल सुलभ और शहरी क्षेत्रों की बपौती है?
क्या पहाड़ों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की कोई कीमत नहीं?
अब यह केवल मांग नहीं, चेतावनी है। यदि कुल्लू जिला प्रशासन, हिमाचल सरकार और जनप्रतिनिधियों ने अब भी इन मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी, तो यह उपेक्षा आने वाले समय में गहरे सामाजिक और राजनीतिक असंतोष में बदलेगी।
आंतरिक सराज भी विकास चाहता है।
बराबरी चाहता है।
और सम्मान चाहता है।
अब सवाल यह नहीं कि समस्या क्या है—
सवाल यह है कि सरकार और व्यवस्था कब जागेगी?

वैसे भी बंजार की पहचान केवल समस्याओं के ही कारण है।

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