फ्रंट पेज न्यूज़ नई दिल्ली/शिमला।
उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए UGC के नए नियमों को लेकर जहां कुछ छात्र संगठन इन्हें “अधूरा” बताकर रोहित एक्ट की मांग कर रहे हैं, वहीं देश के एक बड़े वर्ग की राय इससे अलग भी है। आम नागरिकों, शिक्षाविदों और अभिभावकों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या विश्वविद्यालयों को न्याय के नाम पर और अधिक कानूनी-राजनीतिक जटिलताओं में उलझाना सही दिशा है, या फिर उन्हें पढ़ाई, शोध और गुणवत्ता पर केंद्रित रहने दिया जाना चाहिए।
सार्वजनिक राय का एक मजबूत हिस्सा मानता है कि UGC के नए नियम अपने आप में एक जरूरी और संतुलित सुधार हैं। ये नियम शिकायत निवारण, समान अवसर और संस्थागत जवाबदेही को मजबूत करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इसके साथ ही यह चिंता भी सामने आ रही है कि अगर हर सामाजिक समस्या का समाधान अलग कानून, अलग आयोग और अलग-थलग निगरानी संस्थाओं से किया जाएगा, तो विश्वविद्यालय शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि मुकदमेबाजी और राजनीति के अखाड़े बनते चले जाएंगे।
कई शिक्षाविदों का कहना है कि रोहित वेमुला की दुखद घटना को कोई भी संवेदनशील समाज भूल नहीं सकता, लेकिन हर नई नीति या नियम को किसी एक नाम या घटना से जोड़ देना, भविष्य में संस्थानों को लगातार वैचारिक टकराव में धकेल सकता है। विश्वविद्यालयों की जरूरत ऐसे सिस्टम की है जो निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी हो — न कि ऐसा ढांचा जो पहले से ही दबाव में काम कर रहे प्रशासन और शिक्षकों को और अधिक भय और अनिश्चितता में डाल दे।
आम जनता के बीच यह भी धारणा है कि पिछले कुछ वर्षों में उच्च शिक्षा में असली संकट गुणवत्ता, बेरोजगारी और शोध के गिरते स्तर का है। सवाल यह है कि क्या नए-नए कानून और प्रकोष्ठ बनाने से क्लासरूम की हालत सुधरेगी, लैब्स मजबूत होंगी और छात्रों को बेहतर रोजगार मिलेगा? या फिर इससे केवल फाइलें, समितियां और जांच प्रक्रियाएं बढ़ेंगी?
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हर सामाजिक टकराव को “संस्थागत अपराध” मानकर आपराधिक मुकदमों में बदल देना, शिक्षा के वातावरण को और ज्यादा डर और अविश्वास से भर देगा। विश्वविद्यालयों को सुधार की जरूरत है, लेकिन सुधार संवाद, संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही से आना चाहिए — सिर्फ दंड और कानूनी शिकंजे से नहीं।
OBC, SC, ST, महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है — इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो। लेकिन सार्वजनिक बहस में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रतिनिधित्व और न्याय के नाम पर योग्यता, शैक्षणिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता से समझौता करना सही होगा? अगर हर फैसला राजनीतिक या सामाजिक दबाव में लिया जाएगा, तो विश्वविद्यालय स्वतंत्र ज्ञान के केंद्र नहीं रह पाएंगे।
देश का एक बड़ा वर्ग मानता है कि UGC के नए नियमों को पहले ईमानदारी से लागू करके देखा जाना चाहिए। अगर इनमें कमियां हैं, तो उन्हें समय के साथ सुधारा जा सकता है। लेकिन शुरुआत से ही इन्हें “अपर्याप्त” बताकर एक और बड़े कानून की मांग करना, सुधार से ज्यादा टकराव की राजनीति को बढ़ावा देता है।
आखिरकार, भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था को ऐसे संतुलन की जरूरत है जहां सामाजिक न्याय, गुणवत्ता, स्वायत्तता और जिम्मेदारी — चारों साथ चलें। केवल कानूनों की संख्या बढ़ा देना किसी भी समाज को अपने आप ज्यादा न्यायपूर्ण नहीं बना देता। असली परीक्षा इरादों, अमल और संस्थागत संस्कृति की है।





























