संपादकीय।
चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग की सक्रियता और अचानक चर्चा में आया एक तकनीकी-सा शब्द—SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न)—इन दिनों सियासी बहस का केंद्र बन गया है। आम नागरिक के लिए यह एक औपचारिक सरकारी प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन असल में यह लोकतंत्र की उसी बुनियाद से जुड़ा मामला है, जिस पर “एक व्यक्ति–एक वोट” का सिद्धांत खड़ा है।
भारत जैसे विशाल और गतिशील लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई स्थिर दस्तावेज़ नहीं हो सकती। हर साल लाखों युवा मतदाता बनते हैं, उतने ही लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और कुछ स्वाभाविक कारणों से इस दुनिया से विदा हो जाते हैं। अगर इसके बावजूद मतदाता सूची ज्यों की त्यों बनी रहे, तो वह चुनावी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भ्रम और गड़बड़ी का रजिस्टर बन जाती है। SIR इसी गड़बड़ी को ठीक करने की प्रक्रिया है।
SIR का मूल उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है—मतदाता सूची को शुद्ध, अद्यतन और भरोसेमंद बनाना। इसका लक्ष्य न तो किसी की नागरिकता पर सवाल उठाना है और न ही किसी वर्ग को डराना। बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि जिन लोगों का अब अस्तित्व नहीं है, उनके नाम हटें; जिनके नाम दो जगह दर्ज हैं, वे ठीक हों; और जो युवा पहली बार वोट देने के योग्य हुए हैं, उन्हें लोकतंत्र की मुख्यधारा में जगह मिले।
इस प्रक्रिया के तहत बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं। मतदाता के नाम, उम्र, पते और पहचान से जुड़ी जानकारियों की जांच होती है। जहाँ गलती है वहाँ सुधार, जहाँ अपात्रता है वहाँ विलोपन और जहाँ पात्रता है वहाँ नाम जोड़ा जाता है। यह पूरी प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को मिले अधिकारों के अंतर्गत होती है।
इसके बावजूद, हर बार की तरह इस बार भी SIR को लेकर आशंकाओं और शंकाओं का बाज़ार गर्म है। कोई इसे अधिकारों पर हमला बता रहा है, तो कोई इसे राजनीतिक चश्मे से देखने में जुटा है। लेकिन एक सादा सा सच है—गलत और अशुद्ध मतदाता सूची, निष्पक्ष चुनाव के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर मृत व्यक्ति के नाम पर पड़ा वोट लोकतंत्र को खोखला करता है, तो दोहरी प्रविष्टि भी उसी श्रेणी का अपराध है।
लोकतंत्र नारे और भावनाओं से नहीं, प्रक्रियाओं और पारदर्शिता से मज़बूत होता है। SIR कोई आपातकालीन या असाधारण कदम नहीं, बल्कि चुनावी स्वच्छता की नियमित और ज़रूरी प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया जितनी ईमानदार, निष्पक्ष और पारदर्शी होगी, उतना ही चुनावी नतीजों पर जनता का भरोसा मज़बूत होगा।
अंततः असली सवाल यह नहीं है कि SIR क्यों हो रहा है, बल्कि यह है कि क्या हम एक साफ़, ईमानदार और भरोसेमंद मतदाता सूची के लिए तैयार हैं?
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे पवित्र अधिकार—वोट—तभी अर्थ रखता है, जब वह सही हाथों में हो।





























