फ्रंट पेज न्यूज डेस्क
25 जनवरी हिमाचल प्रदेश के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि लोकतंत्र का दोहरा आईना है। एक ओर यह हिमाचल दिवस है—राज्य के अस्तित्व, संघर्ष और पहचान का स्मरण। दूसरी ओर यही दिन राष्ट्रीय मतदाता दिवस भी है—उस जनशक्ति का उत्सव, जो सरकारें बनाती और बिगाड़ती है। इन दोनों को अलग-अलग देखना आसान है, लेकिन इन्हें समझना तभी संभव है जब इन्हें एक साथ पढ़ा जाए।
हिमाचल प्रदेश का निर्माण कोई साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं था। यह जनता की आकांक्षाओं को मिली राजनीतिक स्वीकृति थी। और लोकतंत्र की यही आत्मा मतदाता दिवस का मूल है। असली सवाल यह नहीं कि हिमाचल कब बना, असली सवाल यह है कि मतदाता ने हिमाचल को कैसा बनाया—और आज वह इसे किस दिशा में ले जा रहा है?
विडंबना यह है कि हिमाचल दिवस अब मंचों का उत्सव बनता जा रहा है और मतदाता दिवस महज़ एक औपचारिकता। जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि राज्य विकास के बड़े-बड़े दावे करता है, लेकिन पहाड़ लगातार पलायन झेल रहा है। योजनाएँ बनती हैं, बजट जारी होते हैं, पर लाभार्थी खोजे जाते हैं। अगर ऐसे में मतदाता की भूमिका केवल वोट डालने तक सीमित रह जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे एक स्मृति बनकर रह जाता है।
मतदाता दिवस यह याद दिलाने के लिए है कि वोट केवल अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता पर नियंत्रण का सबसे बड़ा औज़ार है। सरकारें तभी जवाबदेह होती हैं जब मतदाता सजग और सवाल पूछने वाला होता है। हिमाचल की आज की बड़ी चुनौतियाँ—बेरोज़गारी, पर्यावरणीय संकट, स्वास्थ्य और शिक्षा की असमान पहुँच—किसी दुर्घटना का नतीजा नहीं, बल्कि नीतियों की उपज हैं। और नीति सत्ता से निकलती है। सत्ता तक पहुँचने का रास्ता मतदाता तय करता है।
हिमाचल दिवस पर हम अक्सर अतीत की उपलब्धियाँ गिनाते हैं, लेकिन मतदाता दिवस वर्तमान की जिम्मेदारी सामने रखता है। अगर सरकारें असफल हैं, तो केवल शासन ही कटघरे में नहीं—वह लोकतांत्रिक चुप्पी भी कटघरे में है, जिसने सवाल पूछना छोड़ दिया। लोकतंत्र में मौन भी एक राजनीतिक फैसला होता है।
यह महज़ संयोग नहीं है कि 25 जनवरी को ही ये दोनों दिवस पड़ते हैं। यह तारीख़ साफ़ संकेत देती है कि राज्य की पहचान और मतदाता की चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकती। जब वोट विवेक और सोच के साथ डाला जाता है, तब हिमाचल केवल नक्शे पर नहीं, नीति और नीयत में भी मज़बूत होता है।
आज ज़रूरत है कि हिमाचल दिवस समारोह से आगे बढ़े और मतदाता दिवस नारों से ऊपर उठे। पहाड़ को बचाने की नीति, युवाओं को पलायन से रोकने की ठोस योजना और संसाधनों के संतुलित उपयोग की राजनीति—यह सब तभी संभव है जब मतदाता सजग और सक्रिय होगा।
25 जनवरी का संदेश बिल्कुल साफ़ है—
हिमाचल को बचाना है तो केवल जश्न नहीं, चयन बदलना होगा।
और लोकतंत्र को मज़बूत करना है तो वोट को रस्म नहीं, जिम्मेदारी बनाना होगा।
क्योंकि राज्य दिवस बिना जागरूक मतदाता के अधूरा है,
और मतदाता दिवस बिना जवाबदेह राज्य के बेअसर।
दोनों की सार्थकता एक-दूसरे से जुड़ी है—और दोनों की परीक्षा भी।





























