फ्रंट पेज न्यूज़ वाशिंगटन/विशेष डोज़ियर रिपोर्ट।
दुनिया को लोकतंत्र, मानवाधिकार और आज़ादी का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका अगर अपने ही इतिहास के कटघरे में खड़ा हो, तो उसकी चमकदार इमारतों के पीछे खून, साज़िश, लूट और झूठ की एक लंबी, डरावनी और शर्मनाक गाथा दिखाई देती है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल ने इस सच्चाई को पूरी दुनिया के सामने नंगा कर दिया, लेकिन यह बीमारी नई नहीं है। यह बीमारी अमेरिका की नसों में उसकी स्थापना के साथ ही बहने लगी थी।
आज जब दुनिया “ट्रंप बनाम लोकतंत्र” की बहस देख रही है, तब यह समझना जरूरी है कि ट्रंप कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि उसी अमेरिकी सिस्टम की उपज हैं, जिसने 250 साल से ताकत को ही नीति और युद्ध को ही व्यापार बना रखा है।
1. अमेरिका की नींव ही लाशों पर रखी गई
अमेरिका का निर्माण रेड इंडियन (मूल निवासियों) के नरसंहार से हुआ।
करोड़ों मूल निवासियों को या तो मार दिया गया या उनकी ज़मीनों से खदेड़ दिया गया।
“ट्रेल ऑफ टीयर्स” जैसे जबरन विस्थापन आज भी मानव इतिहास के सबसे क्रूर अध्यायों में गिने जाते हैं।
यह सब “सभ्यता” और “विकास” के नाम पर किया गया।
इसके बाद अफ्रीका से लाए गए गुलामों की पीढ़ियों ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था खड़ी की — बिना अधिकार, बिना सम्मान, बिना इंसान माने।
2. परमाणु बम: हैरी ट्रूमैन का अमिट पाप
1945 में राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने का आदेश दिया।
एक झटके में दो लाख से ज्यादा लोग मारे गए।
आने वाली पीढ़ियाँ भी रेडिएशन से मरती रहीं।
आज भी यह सवाल जिंदा है: क्या जापान को हराने के लिए यह जरूरी था, या दुनिया को डराने का प्रदर्शन?
यह फैसला अमेरिका को “महाशक्ति” तो बना गया, लेकिन मानवता के इतिहास में उसे सबसे बड़ा सामूहिक हत्यारा भी बना गया।
3. कोरिया और वियतनाम: लोकतंत्र के नाम पर आग
कोरियन युद्ध
लाखों लोग मरे, देश तबाह हुआ, और कोरिया आज भी बंटा हुआ है।
वियतनाम युद्ध (जॉनसन और निक्सन का दौर)
30 लाख से ज्यादा वियतनामी मारे गए।
नेपाम बम और एजेंट ऑरेंज जैसे रासायनिक हथियारों ने पीढ़ियों को अपंग बना दिया।
अमेरिका को शर्मनाक हार मिली, लेकिन तब तक एक पूरा देश राख हो चुका था।
वॉटरगेट: निक्सन की चोरी पकड़ी गई
रिचर्ड निक्सन ने अपने ही लोकतंत्र की जासूसी करवाई और झूठ बोला — नतीजा, इस्तीफा। यह साबित हो गया कि व्हाइट हाउस खुद साज़िशों का अड्डा बन चुका है।
4. CIA की साज़िशें: दुनिया भर में तख्तापलट
ईरान (1953), चिली (1973), ग्वाटेमाला, कांगो, इंडोनेशिया…
जहां भी अमेरिका को अपने हित खतरे में दिखे, वहां
चुनी हुई सरकारें गिराईं गईं,
तानाशाह बैठाए गए,
और देशों को दशकों की अराजकता में धकेल दिया गया।
यह सब “कम्युनिज़्म रोकने” के नाम पर किया गया, असल मकसद था — तेल, खनिज और बाजार।
5. रीगन युग: ईरान-कॉन्ट्रा और गुप्त युद्ध
राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के दौर में:
ईरान को चोरी-छिपे हथियार बेचे गए,
उसी पैसे से लैटिन अमेरिका में विद्रोहियों को फंड किया गया,
संसद और जनता दोनों से झूठ बोला गया।
यह साबित हुआ कि अमेरिकी सरकार कानून को भी हथियार की तरह इस्तेमाल करती है।
6. बुश जूनियर और इराक: सदी का सबसे बड़ा झूठ
2003 में जॉर्ज बुश जूनियर ने कहा:
“इराक के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं।”
बाद में साबित हुआ — यह झूठ था।
लाखों इराकी मारे गए,
पूरा मध्य-पूर्व अस्थिर हो गया,
ISIS जैसे आतंकवादी संगठन उसी तबाही की कोख से निकले।
यह युद्ध नहीं था, यह तेल और वर्चस्व की लूट थी।
7. ओबामा: शांति का नोबेल, लेकिन आसमान से मौत
बराक ओबामा को शांति का नोबेल मिला, लेकिन:
ड्रोन हमलों से पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यमन में हजारों लोग मरे,
“कोलेटरल डैमेज” कहकर बच्चों की लाशों को आंकड़ों में बदल दिया गया,
बिना मुकदमे के “टारगेट किलिंग” को सरकारी नीति बना दिया गया।
8. ट्रंप: जब लोकतंत्र खुद अपने घर में गिर पड़ा
डोनाल्ड ट्रंप इस पूरी सड़ी हुई व्यवस्था का सबसे भद्दा चेहरा बनकर सामने आए।
खुली नस्लवादी भाषा
मीडिया और अदालतों पर हमले
चुनाव हारने के बाद सत्ता छोड़ने से इनकार
और 6 जनवरी को संसद पर हमला
यह किसी “तीसरी दुनिया” का तख्तापलट नहीं था — यह अमेरिका के दिल पर हमला था।
9. नस्लभेद और पुलिस राज: अंदर से सड़ता अमेरिका
जॉर्ज फ्लॉयड जैसे सैकड़ों नाम
पुलिस की गोलियाँ और घुटनों से कुचली जाती ज़िंदगियाँ
अश्वेतों, एशियाइयों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत
यह साबित करता है कि अमेरिका आज भी अपने गुलामी वाले अतीत से बाहर नहीं निकल पाया।
10. हथियार उद्योग: असली राष्ट्रपति
अमेरिका में:
राष्ट्रपति बदलते हैं,
लेकिन युद्ध चलते रहते हैं।
क्यों? क्योंकि वहां का मिलिट्री-इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स तय करता है कि अगला दुश्मन कौन होगा।
निष्कर्ष: ट्रंप एक व्यक्ति नहीं, एक सिस्टम का आईना
ट्रंप ने सिर्फ वह कहा और किया, जो यह सिस्टम दशकों से करता आया है — फर्क बस इतना है कि पहले यह सब सभ्य भाषा में होता था, ट्रंप ने उसे नंगा कर दिया।
आज दुनिया को समझना होगा:
अमेरिका कोई “लोकतंत्र का मसीहा” नहीं, बल्कि अपने फायदे के लिए किसी भी देश, किसी भी जनता, किसी भी सच को कुचल देने वाली साम्राज्यवादी शक्ति रहा है।




























