संपादकीय
हिमाचल प्रदेश की पहचान उसकी बर्फ़ से ढकी चोटियों, हरी-भरी घाटियों, कल-कल बहती नदियों, सघन वनों और जीवंत सांस्कृतिक विरासत से है। यही पहचान राज्य के पर्यटन की सबसे बड़ी पूँजी भी है—और आज सबसे अधिक दबाव में भी। पर्यटन ने हिमाचल की अर्थव्यवस्था को गति दी है, लेकिन जब मुनाफ़ा प्रकृति पर हावी होने लगे, तो विकास की यह रफ़्तार आत्मघाती बन जाती है।

पिछले कुछ वर्षों में पर्यटन गतिविधियों का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। होमस्टे, होटल, रिसॉर्ट, एडवेंचर टूरिज़्म और सड़क नेटवर्क ने दूरस्थ इलाक़ों को भी मानचित्र पर ला खड़ा किया। इससे रोज़गार के अवसर बढ़े, स्थानीय आय में इज़ाफ़ा हुआ और ग्रामीण पलायन पर आंशिक विराम लगा। युवा उद्यमिता की ओर मुड़े—यह बदलाव सकारात्मक है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

पर इसी उजले पक्ष के साथ एक स्याह साया भी फैलता गया। अनियंत्रित निर्माण, अवैध ढांचे, क्षमता से अधिक पर्यटक और बुनियादी सुविधाओं पर असहनीय दबाव—इन सबने पहाड़ों की नाज़ुक पारिस्थितिकी को चोट पहुँचाई है। भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ीं, जंगलों की कटाई तेज़ हुई, जलस्रोत सिकुड़ने लगे और कूड़ा-कचरा नदियों तक पहुँचने लगा। जब पर्यटन स्वयं प्रकृति को नुकसान पहुँचाने लगे, तो वह अपने ही भविष्य की नींव खोद देता है।

हिमाचल के लिए पर्यटन केवल व्यवसाय नहीं—एक साझा ज़िम्मेदारी है। उद्योग से जुड़े लोगों को यह समझना होगा कि अल्पकालिक लाभ के लिए प्रकृति से समझौता दीर्घकाल में घाटे का सौदा है। सरकार और प्रशासन की भूमिका भी निर्णायक है: नीतियाँ काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर दिखनी चाहिए। वहन क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी), पंजीकरण, भवन नियम, कचरा प्रबंधन, जल-संरक्षण और सड़क सुरक्षा—इन सब पर सख़्त, पारदर्शी और सतत कार्रवाई समय की मांग है।

स्थानीय समुदाय इस संतुलन की धुरी हैं। जब गाँव, पंचायतें और स्थानीय संगठन निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, तब पर्यटन अधिक संवेदनशील और टिकाऊ होता है। हिमाचल की असली पहचान उसकी संस्कृति, खान-पान और परंपराएँ हैं—इन्हें बाज़ारू तमाशा नहीं, सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

आज हिमाचल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आर्थिक समृद्धि की चाह स्वाभाविक है, पर प्रकृति की क़ीमत पर नहीं। आवश्यकता ऐसे पर्यटन मॉडल की है जो रोज़गार दे, व्यवसाय बढ़ाए और साथ ही पहाड़ों की आत्मा—प्रकृति—की रक्षा करे। संतुलन ही हिमाचल के पर्यटन का भविष्य है, और इसी संतुलन में राज्य की स्थायी प्रगति का रास्ता छिपा है।





























