✍️ संपादकीय
साल 2025 की शुरुआत उम्मीदों और विश्वास के साथ हुई थी। आम धारणा यही थी कि यह वर्ष स्थिरता, विकास और राहत लेकर आएगा। लेकिन वर्ष के मध्य में प्रकृति ने जिस तरह अपना रौद्र रूप दिखाया, उसने न केवल जनजीवन को झकझोर दिया, बल्कि इंसानी सामर्थ्य और व्यवस्थाओं की सीमाओं को भी उजागर कर दिया। यह कोई सामान्य आपदा नहीं थी—यह ऐसा दौर था जिसने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि सभ्यता की सारी उपलब्धियाँ प्रकृति के आगे कितनी असहाय हो सकती हैं।
भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने जैसी घटनाओं ने खेत-खलिहानों को उजाड़ दिया, घर-गांव मिट्टी में मिला दिए और असंख्य परिवारों को बेघर कर दिया। यह त्रासदी केवल आर्थिक या भौतिक क्षति तक सीमित नहीं रही; कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, कई जिंदगियाँ असमय काल का ग्रास बनीं। ऐसे क्षणों में हर संवेदनशील मन से यही भाव निकला—
“शायद ऊपर वाले, तेरी माया सचमुच निराली है।”
हिमाचल प्रदेश के कई हिस्से इस आपदा की चपेट में आए, लेकिन मंडी जिले का सराज क्षेत्र और कुल्लू जिले का बंजार उपमंडल सबसे अधिक प्रभावित रहे। राष्ट्रीय राजमार्ग-305 का लगभग एक महीने तक बंद रहना केवल यातायात की समस्या नहीं था, बल्कि यह जीवनरेखा के कटने जैसा था। हालात इतने गंभीर हुए कि राशन और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए हेलीकॉप्टर सेवाओं का सहारा लेना पड़ा—जो अपने आप में संकट की भयावहता को दर्शाता है।
आंकड़े भी इस दर्दनाक हकीकत की गवाही देते हैं। कुल्लू जिले में 91 परिवारों के घर पूरी तरह तबाह हो गए, जबकि 264 परिवारों को आंशिक क्षति झेलनी पड़ी। इन परिवारों को अपने ही गांवों में पराए ठिकानों पर शरण लेनी पड़ी। वर्षों की मेहनत, जीवनभर की जमा-पूंजी और सपने—सब कुछ पलभर में बह गया। बाढ़ और भूस्खलन ने केवल भूगोल नहीं बदला, बल्कि सैकड़ों परिवारों की जीवन-दिशा भी बदल दी।
अब सवाल यह है कि पुनर्वास और पुनर्निर्माण की रफ्तार क्या होगी? सरकारी घोषणाएँ और नीतियाँ कागज़ से ज़मीन तक कितनी तेज़ी से उतरेंगी—यह आने वाला समय बताएगा। आज भी पीड़ित परिवार उम्मीद भरी निगाहों से हर पहल की ओर देख रहे हैं। इस कठिन दौर में स्वयंसेवी संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और दानवीर व्यक्तियों का योगदान निस्संदेह सराहनीय रहा है, लेकिन यह भी सच है कि मानसिक आघात और जान-माल की क्षति की भरपाई किसी सहायता से पूरी नहीं हो सकती।
फिर भी, इतिहास गवाह है कि मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी आशा है। उसी आशा के सहारे 2025 को विदा दी जा रही है और दुआओं के साथ 2026 का स्वागत किया जा रहा है—इस संकल्प के साथ कि आने वाला वर्ष केवल शुरुआत में ही नहीं, बल्कि अपने मध्य और अंत तक भी सुरक्षित, संतुलित और सुकूनभरा रहे। आवश्यकता इस बात की है कि बीते अनुभवों से सबक लिया जाए, विकास को प्रकृति के साथ संतुलन में रखा जाए और आपदा प्रबंधन को केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि तैयारी का विषय बनाया जाए।
इन्हीं प्रार्थनाओं, सकारात्मक संकल्पों और सामूहिक जिम्मेदारी के भाव के साथ देश-प्रदेश का जनमानस 2026 का अभिनंदन कर रहा है—इस उम्मीद में कि नया वर्ष त्रासदी नहीं, बल्कि स्थायित्व, संवेदनशीलता और मानवीय एकजुटता की नई कहानी लिखे।
2025 को विदा, 2026 का स्वागत : त्रासदी, संघर्ष और उम्मीद का संकल्प













