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हिमाचल पर्यटन निगम के 14 होटलों के निजीकरण पर बवाल, कर्मचारी बोले—‘सरकारी संपत्ति नहीं जाने देंगे

शिमला (फ्रंटपेज न्यूज़)

हिमाचल प्रदेश सरकार ने घाटे में चल रहे हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम (एचपीटीडीसी) के चौदह होटलों को ‘ऑपरेशन-एंड-मेंटेनेंस’ मॉडल पर निजी क्षेत्र को देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव के ताज़ा निर्देशों के बाद, निगम के प्रबंध निदेशक को यह काम जल्द पूरा करने को कहा गया है। सरकार का तर्क है कि होटल लगातार घाटा झेल रहे हैं और उन्हें पुनर्जीवित करने के सभी सरकारी प्रयास विफल रहे हैं। इस कदम को 28 जून 2025 की कैबिनेट बैठक में मंज़ूरी मिली थी।

फैसले के दायरे में स्वारघाट का होटल ‘हिल टॉप’, बिलासपुर का ‘लेकव्यू’, दाड़लाघाट का ‘भागल’, भराड़ीघाट का ‘वेसाइड एमेनिटी’, चिंडी का ‘ममलेश्वर’, फागु का ‘एप्पल ब्लॉसम’, परवाणू का ‘शिवालिक’, खड़ापत्थर का ‘गिरीगंगा’, रोहड़ू का ‘चांशल’, राजगढ़ का ‘टूरिस्ट इन’, कुल्लू का ‘सरवरी’, कसौली का ‘ओल्ड रोसकॉमन’, धर्मशाला का ‘कश्मीर हाउस’ और जोगिंद्रनगर का ‘उहल’ शामिल हैं। करोड़ों रुपये की लागत से बने ये होटल राज्य के अलग-अलग पर्यटन केन्द्रों में स्थित हैं।

सरकारी आदेश सामने आते ही पर्यटन निगम के स्थायी और अनुबंधित कर्मचारियों में हड़कंप मच गया। कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारी राज कुमार ने चेतावनी दी कि “सरकारी सम्पत्तियों को औने-पौने दामों पर निजी हाथों में सौंपने की यह कोशिश हम हर स्तर पर रोकेंगे।” यूनियन ने निर्णय की विस्तृत समीक्षा शुरू कर दी है और जल्द ही चरणबद्ध आंदोलन की रणनीति तय करेगी। कर्मचारियों का कहना है कि हाल के वर्षों में निगम की राजस्व आय में सुधार देखने को मिला है; ऐसे में घाटे का हवाला देकर निजीकरण करना अव्यावहारिक और पक्षपातपूर्ण है।

पर्यटन निगम के निदेशक राजीव ने स्पष्ट किया कि “यह निर्णय पूरी तरह कैबिनेट स्तर पर लिया गया है। होटलों को लीज़ पर देने की प्रक्रिया तथा कर्मचारियों की सेवा-शर्तें क्या होंगी, इस पर विस्तृत दिशा-निर्देश जल्द जारी किए जाएंगे।” हालांकि कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि निजी ऑपरेटर्स के आने के बाद उनकी नौकरी और भविष्य सुरक्षित रहेगा या नहीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि निजी क्षेत्र की प्रबंधन क्षमता और पूंजी निवेश से इन होटलों को नई पहचान मिल सकती है, मगर कर्मचारी विरोध और पारदर्शिता की कमी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। आने वाले हफ्तों में जब निविदा शर्तें सार्वजनिक होंगी, तब यह साफ़ होगा कि सरकारी दावे—‘होटल बचाने’—और कर्मचारियों की आपत्ति—‘संपत्ति बचाने’—के बीच संतुलन कैसे साधा जाएगा।

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