फ्रंट पेज न्यूज़ का आकलन।
“गड्ढों में दफ़्न विकास”
सन् 2025 का आया वो साल,
जब सड़कें चिल्लाईं—“हम हैं बेहाल!”
एनएच-305 की टूटी शान,
खच्चर पथ बना उसकी पहचान।
जिसे कहा था जीवन की रेखा,
आज वही बना जनता का लेखा—
हर झटका एक हिसाब लिखे,
हर गड्ढा शासन का जवाब लिखे।
फल-सब्ज़ी, सैलानी, व्यापार की डोर,
सब फँसे गहराते गड्ढों के शोर,
जहाँ विकास के सपने थे बोए,

वहीं अब निराशा के काँटे रोए।
नेता बोले—“इतिहास रच दिया!”
जनता हँसी—“गड्ढों से सजा दिया!”
भाषणों में उड़ते सपनों के जहाज़,
ज़मीन पर रेंगता टूटा समाज।
अधिकारी आए निरीक्षण के नाम,
कैमरों में कैद हुआ बस उनका काम,
सेल्फी की मुस्कान, दिखावा महान,
और फिर गायब जैसे था ही न जहान।
कागज़ों पर सड़कें चमचमाती रहीं,
जमीं पर किस्मत फिसलती रही,
फाइलों में तरक्की की चकाचौंध,
हकीकत में धूल, गड्ढे और क्रंदन का मौन।
बसें थमीं, कदमों ने थामा सफर,
हर मोड़ बना जैसे मौत का दर,
जो बच गया वो पहुँचा घर तक,
बाकी ने सीखा—गिरकर संभलने का सबक।
बंजार की वादियों में गूँजता तंज,
“विकास” अब बन गया कड़वा व्यंग्य,
हर पहाड़ पूछे—कब आएगा वो दिन?
जब सड़क नहीं, इंसान भी हो सुरक्षित फिर।
सवाल हवा में तैरता आज,
कब जागेगा सोया प्रशासन का राज?
या फिर यूँ ही गड्ढों में देश गढ़ेगा,
और हर सपना धूल में सड़ता रहेगा?
ये 2025 का कैसा कमाल,
टूटे रास्ते, टूटे हर ख्वाब और हाल,
जब जीवन रेखा ही बीमार पड़े,
तो उम्मीदें भी कब तक ज़िंदा रहें?
कटाक्ष यही, यही सच्चाई,
विकास की गाड़ी फँसी गहराई,
जब मंज़िल ही गड्ढों में खो जाएगी,
तो तरक्की सिर्फ़ कागज़ों में मुस्कुराएगी















