Site icon

बजट में नीयत और हकीकत का फासला, जनता को फिर मिली निराशा— एचपीसीसी लीगल सेल महासचिव अरुण प्रकाश आर्य

फ्रंट पेज न्यूज़ शिमला।
हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी लीगल सेल के महासचिव पंडित अरुण प्रकाश आर्य ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि इस बजट से देश की जनता को कई उम्मीदें थीं, लेकिन यह बजट उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया।
उन्होंने कहा कि हर बार की तरह इस बार भी सरकार ने यह दावा किया कि बजट आम आदमी, किसान, युवा, महिला और मध्यम वर्ग को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है। नीयत और मंशा के स्तर पर ये बातें अच्छी लगती हैं और सुनने में भरोसा भी जगाती हैं, लेकिन जब बजट को ज़मीनी हकीकत की कसौटी पर परखा जाता है, तो तस्वीर बिल्कुल उलट नज़र आती है।
अरुण प्रकाश आर्य ने कहा कि महंगाई, बेरोज़गारी और लगातार घटती क्रय-शक्ति जैसे ज्वलंत मुद्दों पर सरकार कोई ठोस रोडमैप देने में पूरी तरह असफल रही है। आम आदमी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन बजट में उसकी पीड़ा को दूर करने का कोई ठोस समाधान दिखाई नहीं देता।
किसानों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि देश का किसान आज भी फसल के उचित मूल्य और कर्ज़ से राहत की आस लगाए बैठा है। बावजूद इसके, बजट में उनके लिए कोई निर्णायक और भरोसेमंद कदम सामने नहीं आया। केवल योजनाओं के नाम गिनाना किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।
युवाओं को लेकर आर्य ने कहा कि रोज़गार सृजन की बातें बार-बार दोहराई गईं, लेकिन ऐसी व्यावहारिक योजनाओं का अभाव साफ दिखता है जो वास्तव में स्थायी रोज़गार पैदा कर सकें। मध्यम वर्ग पहले ही टैक्स के बोझ तले दबा हुआ है और इस बजट में उसे राहत देने के बजाय लगभग नज़रअंदाज़ किया गया है।
गरीब और वंचित वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के विस्तार की जो उम्मीद थी, वह भी पूरी नहीं हुई। कई जगहों पर कटौती और केवल औपचारिक घोषणाएँ ही देखने को मिलीं। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता जैसे अहम मुद्दों पर न तो पर्याप्त संसाधन नज़र आते हैं और न ही कोई स्पष्ट प्राथमिकता तय की गई है।
उन्होंने कहा कि छोटे व्यापारी और MSME सेक्टर, जो नोटबंदी, जीएसटी और महंगाई के बाद से लगातार संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें उबारने के लिए भी बजट में कोई ठोस आर्थिक पैकेज नहीं दिया गया।
हालांकि, अरुण प्रकाश आर्य ने यह भी कहा कि बजट को केवल आलोचना तक सीमित रखना समाधान नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकार जनता की वास्तविक समस्याओं को स्वीकार करे और नीति निर्माण में उन्हें केंद्र में रखे। यदि किसानों को सही मूल्य, युवाओं को स्थायी रोज़गार, महिलाओं को सुरक्षा व आत्मनिर्भरता और मध्यम वर्ग को कर राहत दी जाए, तो यही बजट देश की दिशा बदल सकता है।
अंत में उन्होंने कहा कि जनता आज शब्दों और आंकड़ों से नहीं, बल्कि ईमानदार नीयत और ठोस फैसलों से भरोसा चाहती है। तभी “सबका साथ, सबका विकास” केवल नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई बन पाएगा। मौजूदा बजट से आम जनमानस को निराशा की सौगात ही मिली है।

Exit mobile version