महीनों तक कटा रहा संपर्क, अब सड़क ठीक — फिर भी HRTC बस सेवा बंद, 2000 की आबादी कैद जैसी जिंदगी जीने को मजबूर
फ्रंट पेज न्यूज़ बंजार।
2025 की आपदा में क्षतिग्रस्त हुई सजवाड़ सड़क भले ही अब काग़ज़ों में और तकनीकी रूप से “ठीक” कर दी गई हो, लेकिन इस सड़क से जुड़े करीब 2000 की आबादी वाले क्षेत्र के लोगों की मुश्किलें आज भी जस की तस बनी हुई हैं। वजह साफ है — HRTC की बस सेवा अब तक बहाल नहीं की गई।उल्लेखनीय है कि सजवाड़ ग्राम पंचायत, उपमंडल बंजार की करीब 2000 की आबादी इस संकट से सीधे तौर पर प्रभावित है। यह पूरा क्षेत्र लंबे समय से बंजार से जुड़ने वाली इसी सड़क और HRTC बस सेवा पर निर्भर रहा है, लेकिन बस सेवा बंद होने से ग्रामीणों को रोजमर्रा के काम, शिक्षा, इलाज और प्रशासनिक कार्यों के लिए भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी झेलनी पड़ रही है।
आपदा के बाद महीनों तक यह इलाका पूरी तरह कटा रहा। लोगों ने जैसे-तैसे हालात झेले। अब जब सड़क बहाल हो चुकी है, तो जनता को उम्मीद थी कि सरकारी बस सेवा भी शुरू होगी, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता ने लोगों को एक बार फिर निजी टैक्सियों और महंगे साधनों के भरोसे छोड़ दिया है।
बस नहीं, तो जेब से रोज़ाना लूट
सजवाड़ और आसपास के गांवों से बंजार पहुंचने के लिए आज लोगों को प्रति व्यक्ति 150 से 200 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
गरीब, मजदूर, छात्र और बुज़ुर्ग — सभी पर यह बोझ रोज़ का आर्थिक जुल्म बन चुका है।
इमरजेंसी मतलब 1500 रुपये का झटका
सबसे गंभीर हालत तब होती है जब कोई बीमार या गंभीर मरीज हो।
सजवाड़ से बंजार अस्पताल पहुंचाने के लिए टैक्सी का किराया 1000 से 1500 रुपये तक देना पड़ता है।
कई मामलों में पैसे की कमी इलाज में देरी का कारण बन रही है, जो सीधे तौर पर जानलेवा साबित हो सकता है।सड़क है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी गायब
सबसे बड़ा सवाल यही है कि
जब सड़क ठीक हो चुकी है, तो वर्षों से चल रही HRTC की बस सेवा अब तक क्यों शुरू नहीं हुई?
क्या यह क्षेत्र प्रशासन के नक्शे से ही गायब हो चुका है?
क्या गरीब और ग्रामीण जनता की परेशानियों की कोई कीमत नहीं?
जनता में बढ़ता आक्रोश
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे पहले आपदा की मार झेल चुके हैं और अब सरकारी लापरवाही की सजा भुगत रहे हैं। अगर जल्द बस सेवा बहाल नहीं हुई, तो लोग आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।
यह सिर्फ सड़क नहीं, व्यवस्था की नाकामी है
यह मामला सिर्फ एक बस सेवा का नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति सरकार की संवेदनहीनता का आईना है।
अगर समय रहते फैसला नहीं हुआ, तो यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा जन आंदोलन बन सकता है।

