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स्वावलंबन या असहायता? अटकी सब्सिडी और डगमगाता भरोसा

150 करोड़ की सब्सिडी फंसी, हजारों उद्यमी कर्ज में — क्या सरकार स्वरोज़गार को सच में प्राथमिकता दे रही है?

संपादकीय।

हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना का उद्देश्य था—युवाओं को नौकरी मांगने वाला नहीं, नौकरी देने वाला बनाना। लेकिन आज यही योजना अपने नाम के उलट स्वावलंबन नहीं, असहायता की प्रतीक बनती जा रही है। जिन युवाओं और उद्यमियों ने सरकार की नीति पर भरोसा कर उद्योग शुरू किए, वे आज बैंकों की किश्तों और अटकी सब्सिडी के बीच पिस रहे हैं।
तथ्य बेहद चिंताजनक हैं। योजना के तहत स्वीकृत करीब 150 करोड़ रुपये की सब्सिडी अब तक लंबित है। उद्योग विभाग के अनुसार 7327 प्रोजेक्ट स्वीकृत हुए, लेकिन केवल 4253 मामलों में ही पूरी सब्सिडी मिल पाई। शेष 3074 मामलों में आंशिक भुगतान के बाद फाइलें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। सवाल सीधा है—जब सरकार के पास समय पर भुगतान की व्यवस्था नहीं थी, तो लोगों को निवेश के लिए प्रेरित क्यों किया गया?
सब्सिडी की अगली किस्त न मिलने से सैकड़ों छोटे उद्योग डूबने की कगार पर हैं। कार्यशील पूंजी खत्म हो रही है, बैंक का दबाव बढ़ रहा है और कई उद्यमी डिफॉल्टर बनने की कगार पर खड़े हैं। यह वही लोग हैं जिन्हें स्वरोज़गार का “मॉडल उदाहरण” बनाकर पेश किया गया था।
विडंबना यह है कि अब सरकार ने नए प्रोजेक्ट्स की मंजूरी पर भी ब्रेक लगा दिया है। यानी न पुराने घाव भर रहे हैं, न नए अवसर पैदा हो रहे हैं। 2025 में आए 35 प्रस्ताव आज भी फाइलों में दफन हैं। यह स्थिति बताती है कि योजना कागज़ पर तो चल रही है, लेकिन ज़मीन पर उसकी सांसें उखड़ चुकी है हैं।
उद्योग मंत्री का कहना है कि योजना बंद नहीं हुई है और भुगतान जल्द होगा। लेकिन सवाल यह नहीं है कि भुगतान होगा या नहीं, सवाल यह है कि इतनी देर क्यों हुई? क्या सरकार यह भूल गई कि उद्यमी हवा में नहीं, कर्ज लेकर उद्योग लगाते हैं और बैंक किस्तें तारीख देखकर नहीं, कैलेंडर देखकर मांगता है?
यह भी समझना होगा कि स्वरोज़गार योजनाएं सिर्फ घोषणाओं से नहीं, भरोसे से चलती हैं। और भरोसा एक बार टूटा तो अगली बार कोई भी युवा जोखिम उठाने को तैयार नहीं होता।
आज मुख्यमंत्री स्वावलंबन योजना एक नीतिगत चेतावनी बन चुकी है—कि अगर सरकार ने इसे तुरंत नहीं संभाला, तो यह योजना रोजगार सृजन का उदाहरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक अव्यवस्था की केस स्टडी बनकर रह जाएगी।
स्वावलंबन का अर्थ अपने पैरों पर खड़ा होना होता है। लेकिन हिमाचल में आज हालत यह है कि सरकार की ही देरी ने हजारों लोगों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका दी है।
अब भी समय है—सरकार को चाहिए कि वह इसे फाइलों का नहीं, भरोसे का मामला समझे और लंबित भुगतान को युद्धस्तर पर निपटाए। वरना यह योजना इतिहास में एक और अच्छे इरादे, बुरे अमल की मिसाल बनकर दर्ज हो जाएगी।

मुख्य संपादक फ्रंट पेज न्यूज़ परमेश शर्मा की कलम से
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