संपादकीय
भारत का वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना निस्संदेह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (Nominal GDP) के आधार पर भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए यह स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि केवल आँकड़ों की जीत नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक क्षमता, नीतिगत सुधारों और वैश्विक विश्वास का प्रतीक है।
पिछले एक दशक में भारत ने बुनियादी ढांचे, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, सेवा क्षेत्र और विनिर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, जीएसटी, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े निवेश ने आर्थिक गति को मजबूती दी है। वैश्विक कंपनियों के लिए भारत एक भरोसेमंद निवेश गंतव्य बनकर उभरा है।
हालाँकि, इस उपलब्धि के साथ कुछ गंभीर प्रश्न भी जुड़े हैं। क्या आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँच रहा है? आज भी देश की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, जहाँ आय अस्थिर बनी हुई है। बेरोज़गारी, विशेषकर शिक्षित युवाओं में, एक बड़ी चुनौती है। महँगाई और बढ़ती असमानता विकास की चमक पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अभी भी पीछे है। इसका अर्थ यह है कि आर्थिक विस्तार के साथ-साथ सामाजिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल निर्माण पर समान रूप से ध्यान देना अनिवार्य है।
भारत के सामने अब अवसर के साथ जिम्मेदारी भी है। यदि नीति-निर्माण में समावेशिता, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती, MSME सेक्टर का संरक्षण और मानव संसाधन में निवेश को प्राथमिकता दी गई, तो भारत न केवल आकार में बल्कि गुणवत्ता में भी एक सशक्त अर्थव्यवस्था बन सकता है।
अंततः, चौथा स्थान एक मंज़िल नहीं, बल्कि एक संकेत है—कि भारत सही दिशा में बढ़ रहा है। अब आवश्यकता है इस विकास को जन-जन तक पहुँचाने और आर्थिक शक्ति को सामाजिक समृद्धि में बदलने की।
भारत की अर्थव्यवस्था: चौथे स्थान की उपलब्धि, पर क्या यह समावेशी विकास है?

